जबलपुर, 5 फरवरी 2026: सरकारी सिस्टम में यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है कि यदि प्राधिकृत अधिकारी किसी मामले में गलत फैसला लेता है तो शासन स्तर पर उसको सुधार दिया जाता है लेकिन भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी के मामले में कर्मचारी के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी को लेकर हाईकोर्ट ने एक ऐसा चौंकाने वाला जजमेंट दिया है जो न केवल सिस्टम को बदलने पर मजबूर कर देगा बल्कि भ्रष्टाचार के आरोपी कर्मचारियों द्वारा इसका भरपूर उपयोग किया जाएगा।
लोकायुक्त ने रिश्वत लेते पकड़ा था, PIC ने अभियोजन की मंजूरी नहीं दी
याचिकाकर्ता अनिरुद्ध नागर के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस (विशेष पुलिस स्थापना) ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) की धाराओं (7, 13(1)(b) और 13(2)) के तहत मामला दर्ज किया था। उन पर रिश्वत लेने का आरोप था। चूंकि याचिकाकर्ता नगर पालिका का कर्मचारी था, इसलिए उस पर मुकदमा चलाने की मंजूरी देने का अधिकार 'प्रेसिडेंट-इन-काउंसिल' (PIC), नगर पालिका परिषद, आष्टा के पास था। 24 जून 2022 को PIC ने मामले के तथ्यों पर विचार किया और पाया कि मामला, 'केवल एक विभागीय जांच का है, आपराधिक मुकदमे का नहीं'। अतः, PIC ने मुकदमा चलाने की मंजूरी (Prosecution Sanction) देने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।
PIC को इस मामले पर विचार करने का अधिकार नहीं
इसके बाद, राज्य सरकार के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने 30 मई 2023 को एक आदेश जारी किया, जिसमें PIC द्वारा मंजूरी न देने के निर्णय को 'अवैध' बताते हुए रद्द कर दिया। राज्य शासन के निर्देश पर, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग के आयुक्त ने 17 जुलाई 2023 को याचिकाकर्ता के विरुद्ध मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी। याचिकाकर्ता ने इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
मुख्य कानूनी विवाद
क्या एक बार 'सक्षम प्राधिकारी' (PIC) द्वारा मंजूरी देने से इनकार करने के बाद, कोई उच्च अधिकारी या सरकार उस निर्णय को बदलकर स्वयं मंजूरी दे सकती है?
न्यायालय और न्यायाधीश का विवरण
न्यायालय: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ जबलपुर।
न्यायाधीश: माननीय न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और माननीय न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी (खंडपीठ)।
आदेश की तिथि: 04 फरवरी, 2026
न्यायालय का तर्क और निर्णय
न्यायालय ने मामले की सुनवाई के बाद निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19(1) के तहत मंजूरी देने की शक्ति केवल उसी अधिकारी/प्राधिकारी के पास है जो कर्मचारी को पद से हटाने की शक्ति रखता है (इस मामले में PIC, आष्टा)।
कानून के अनुसार, यदि सक्षम प्राधिकारी ने एक बार उपलब्ध तथ्यों के आधार पर मंजूरी देने से इनकार कर दिया है, तो वह निर्णय अंतिम होता है। शासन या कोई अन्य अधिकारी उस अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं कर सकता।
कोर्ट ने पाया कि मंजूरी देने की शक्ति को 'डेलीगेट' (प्रत्यायोजित) नहीं किया जा सकता और न ही किसी वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर थोपा जा सकता है।
हाई कोर्ट का अंतिम निर्णय
अदालत ने याचिका स्वीकार कर ली और 30.05.2023 (शासन का आदेश) तथा 17.07.2023 (आयुक्त द्वारा दी गई मंजूरी) को निरस्त (Set aside) कर दिया। इसके साथ ही, इस अवैध मंजूरी के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई आगे की सभी कानूनी कार्यवाहियों को भी रद्द कर दिया गया।

.webp)