मध्य प्रदेश के 4.38 लाख करोड़ के बजट में पर्यावरण को सिर्फ 31 करोड़, क्या हम प्रकृति को बेच रहे हैं?"

Updesh Awasthee

Madhya Pradesh Allocates Just ₹31 Crore for Environment in ₹4.38 Lakh Crore Budget

मध्य प्रदेश के 4.38 लाख करोड़ रुपये के बजट में पर्यावरण संरक्षण के लिए महज 31 करोड़ रुपये का प्रावधान, यह आंकड़ा चौंकाने वाला है! जबकि राज्य सूखा, अनियमित मानसून, बाढ़ और जंगल की आग जैसी जलवायु चुनौतियों से जूझ रहा है, विकास के नाम पर इंफ्रास्ट्रक्चर और अन्य क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा रही है। क्या हम आर्थिक तरक्की के चक्कर में अपनी प्राकृतिक पूंजी को खतरे में डाल रहे हैं? यह सवाल उठता है कि सतत विकास का दावा कितना सच्चा है, जब प्रकृति को इतनी कम अहमियत दी जा रही है।

पर्यावरण संकट और पूंजी का संबंध

पर्यावरण के साथ पूंजी के संबंध के मामले में पहले की तमाम बुराइयाँ आज उन क्षेत्रों में प्रकट हो गई हैं, जिन्हें आमतौर पर "पर्यावरण संकट" कहा जाता है। इसमें ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत का क्षरण, उष्णकटिबंधीय जंगलों का विनाश, मछलियों की बेतहाशा मौत, प्रजातियों का विलोपन, जैव-विविधता का नुकसान, वातावरण और भोजन में जहर का घुलना, मरुस्थलीकरण, जलापूर्ति का सिकुड़ना, साफ पानी का अभाव तथा रेडियोएक्टिव प्रदूषण शामिल हैं।  

इसलिए पर्यावरण संबंधी उन दशाओं को, जिनका मानव समाज पर सर्वाधिक प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, ध्यान में रखते हुए आर्थिक विकास की योजनाएँ इस तरह बनानी चाहिए कि उनमें जल संसाधनों और उनके विस्तार, साफ पानी की उपलब्धता, संसाधनों का वितरण एवं संरक्षण, कचरे का निपटान तथा आबादी और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए चुने गए स्थानों से संबंधित पर्यावरणीय प्रभाव जैसे कारकों को प्राथमिकता दी जाए। बजट निर्माण में इन कारकों को देखते हुए आवंटन अधिक प्रासंगिक होगा।  

बजट: विकास की अवधारणा का प्रतिबिंब  

बजट केवल आँकड़े और योजनाएँ प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि यह विकास की एक गहरी अवधारणा को भी प्रतिबिंबित करता है, कि विकास क्या है और देश आर्थिक वृद्धि कैसे हासिल करना चाहता है। बजट आवंटन इस बात को दर्शाता है कि किन चीजों को महत्व दिया जाता है, किसके हितों की रक्षा की जाती है और विकास की पारिस्थितिक लागत कौन वहन करता है।  

ऐसे समय में जब जलवायु संकट, पर्यावरण का क्षरण और सामाजिक असमानताएँ बढ़ती जा रही हैं, बजट का पारिस्थितिक परिप्रेक्ष्य से विश्लेषण करना आवश्यक है। भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दो ऐसे लक्ष्य हैं, जिनका संतुलन रखना आज सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। विकास कार्यक्रमों, बुनियादी ढाँचे, रोजगार सृजन और आर्थिक वृद्धि पर जोर देना आवश्यक है, परंतु इसके साथ-साथ पर्यावरणीय स्थिरता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।  

मध्य प्रदेश: जलवायु जोखिमों का सामना

मध्य प्रदेश भौगोलिक दृष्टि से भारत का केंद्रीय राज्य है, जिसकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि, वन एवं खनिज संसाधनों पर आधारित है। राज्य में सूखा, अनियमित मानसून, बाढ़, हीट वेव और जंगलों में आग जैसी घटनाएँ जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष संकेत हैं। अतः 2026-27 का बजट केवल आर्थिक दस्तावेज न होकर जलवायु-जोखिम प्रबंधन का नीति-पत्र भी होना चाहिए था।  

मध्य प्रदेश सरकार ने 2026-27 के लिए 4,38,317 करोड़ रुपये का बजट पेश किया है। पर्यावरण संरक्षण के लिए मात्र 31 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष के 39 करोड़ रुपये से लगभग 20 प्रतिशत कम है। बजट में सौर ऊर्जा, हरित ऊर्जा निवेश और ई-वाहन प्रोत्साहन जैसे उपायों पर जोर है, परंतु सूखा-प्रबंधन, वर्षा जल संचयन, जलग्रहण विकास, जल-संरक्षण आधारित कृषि और जलवायु-लचीली फसलों पर व्यय तुलनात्मक रूप से कम दिखता है। जबकि राज्य की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है।  

बजट में क्षेत्रीय असंतुलन और प्राथमिकताएँ

जलवायु जोखिमों के अंतर्गत बुंदेलखंड में सूखा, नर्मदा घाटी में बाढ़ तथा आदिवासी क्षेत्रों में वन क्षरण के अनुसार बजट में स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं। वनीकरण, कैंपा फंड उपयोग और वन्यजीव संरक्षण के प्रावधान तो हैं, लेकिन सामुदायिक वन प्रबंधन और ग्राम सभा आधारित संरक्षण पर अपेक्षित जोर नहीं है। खनन और अवसंरचना परियोजनाओं को दी गई प्राथमिकता वनों पर दबाव बढ़ाएगी। विकास-प्रधान मॉडल और पारिस्थितिकी संरक्षण के बीच संतुलन स्पष्ट नहीं दिखता।  

नर्मदा, ताप्ती, बेतवा जैसी नदियों के पुनर्जीवन कार्यक्रमों की घोषणा सकारात्मक है, परंतु बड़े बाँधों और नहर परियोजनाओं पर अधिक खर्च छोटे जल-संरक्षण मॉडलों जैसे तालाब, चेक-डैम और परंपरागत जल संरचनाओं की तुलना में ज्यादा है। विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन के बजाय केंद्रीकृत ढाँचे पर निर्भरता जलवायु लचीलापन कम कर सकती है। जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लिए विशेष बजटीय संरक्षण का अभाव है।  

शहरी विकास और कृषि चुनौतियाँ

बजट में स्मार्ट सिटी और शहरी अवसंरचना पर व्यय है, परंतु शहरी हरित क्षेत्र, जल निकासी सुधार और हीट एक्शन प्लान के लिए पृथक आवंटन स्पष्ट नहीं है। जबकि प्रदेश में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चरम मौसम घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं। बढ़ते तापमान के कारण 2050 तक गेहूँ उत्पादन में 6 से 23 प्रतिशत तक की गिरावट हो सकती है। 2023 की तुलना में 2024 में गेहूँ उत्पादन में 33 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई, जो भारत में सबसे अधिक है। इसे नियंत्रित करने के लिए प्रभावी और ठोस कार्ययोजना का बजट में अभाव है।  

केंद्रीय बजट: पर्यावरण की उपेक्षा

दूसरी ओर, केंद्रीय बजट 2026-27 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को लगभग 3,759.46 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 8 प्रतिशत अधिक है। पर विशेषज्ञों के अनुसार यह अभी भी भारत के विशाल पर्यावरणीय जोखिमों और आवश्यकता के अनुरूप पर्याप्त नहीं है। केंद्रीय बजट में बुनियादी जीवाश्म ईंधन, खनन और पारंपरिक अवसंरचना पर भारी ध्यान है, जबकि पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिक लागतों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।  

उच्च-कार्बन उद्योगों से आर्थिक निर्भरता हटाने में कदम पर्याप्त नहीं हैं और अभी भी पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर भारी निवेश हो रहा है। बजट का एक बड़ा हिस्सा "बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर" पर केंद्रित है, यानी राजमार्गों, शहरों, बंदरगाहों और अन्य बड़े ढाँचागत परियोजनाओं पर भारी खर्च। सरकार का दावा है कि इससे रोजगार सृजित होंगे और अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी। लेकिन इन परियोजनाओं का पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव अक्सर छूट जाता है या जानबूझकर उल्लेख नहीं किया जाता।  

केंद्र की आर्थिक सर्वेक्षण में विकास परियोजनाओं के लिए वन स्वीकृतियों को बाधा बताया गया है, जबकि व्यवहार में स्वीकृतियाँ अक्सर तेजी से दी जाती हैं। कुल मिलाकर, बजट ने अवसंरचना को इस तरह बढ़ावा दिया मानो उसके पारिस्थितिक और सामाजिक प्रभाव महत्वहीन हों। जब जंगलों को बाधा के रूप में देखा जाता है, सार्वजनिक परिवहन के बजाय लग्जरी ट्रेनों पर जोर दिया जाता है और समुद्री तटों को निजी कंपनियों को सौंप दिया जाता है, तब हम केवल निर्माण नहीं कर रहे होते, बल्कि पर्यावरण और समुदायों को जोखिम में डाल रहे होते हैं।  

आर्थिक सर्वेक्षण ने स्वीकार किया है कि केवल 37 प्रतिशत शहरी आबादी को सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध है, लेकिन बजट में इसे सुधारने के लिए ठोस कदम नहीं दिखते। शहरों की कल्पना कारों और हवाई अड्डों से भरे भविष्य के रूप में की जा रही है। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी संस्थान (नीरी), नागपुर ने अपने अध्ययन में बताया है कि देश की 30 प्रतिशत भूमि में उत्पादकता समाप्त हो गई है। इसलिए किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित करने के लिए निवेश की जरूरत है, जबकि कृषि बजट उर्वरक सब्सिडी पर केंद्रित रहता है।  

निष्कर्ष: प्राकृतिक पूंजी का संरक्षण  

स्वस्थ भूमि संपन्न अर्थव्यवस्थाओं का आधार है। वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का आधा से अधिक हिस्सा प्रकृति पर निर्भर है। फिर भी हम इस प्राकृतिक पूंजी को खतरनाक दर से नष्ट कर रहे हैं। इससे जैव-विविधता का नुकसान होता है, सूखे का खतरा बढ़ता है और समुदाय विस्थापित होते हैं। मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखा हमारे समय की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक हैं।  

जलवायु संकट से निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति प्रस्तुत नहीं की गई है। सरकार को चाहिए कि वह एक स्पष्ट बजट लाइन, समर्पित वित्तीय रणनीति और विभागीय समन्वय सुनिश्चित करे, ताकि जलवायु कार्य योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके और कमजोर समुदायों को सुरक्षा प्रदान की जा सके।  
लेखक - राज कुमार सिन्हा (बरगी बाँध विस्थापित एवं प्रभावित संघ)
भोपाल समाचार से जुड़िए
कृपया गूगल न्यूज़ पर फॉलो करें यहां क्लिक करें
टेलीग्राम चैनल सब्सक्राइब करने के लिए यहां क्लिक करें
व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए  यहां क्लिक करें
X-ट्विटर पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
फेसबुक पर फॉलो करने के लिए यहां क्लिक करें
समाचार भेजें editorbhopalsamachar@gmail.com
जिलों में ब्यूरो/संवाददाता के लिए व्हाट्सएप करें 91652 24289

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Check Now
Ok, Go it!