बिना टिकट मुफ्त यात्रियों को बीमा मुआवजे पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, insurance dispute

Updesh Awasthee
ग्वालियर, 12 फरवरी 2026
: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने 'मुफ्त यात्रियों' (Gratuitous Passengers) से जुड़ी दुर्घटनाओं में मुआवजे को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। न्यायालय ने आदेश दिया है कि भले ही यात्री वाहन में मुफ्त यात्रा कर रहे हों और उनके लिए कोई प्रीमियम न दिया गया हो, बीमा कंपनी मुआवजे के भुगतान से पूरी तरह बच नहीं सकती। 

मामले की पूरी कहानी: मेले में जा रहे श्रद्धालुओं के साथ हादसा

यह मामला 9 अप्रैल 2007 का है। कुछ लोग ट्रैक्टर-ट्रॉली (नंबर MP-06-JA-4684) पर सवार होकर 'माता का मेला' देखने जा रहे थे। जैसे ही ट्रैक्टर बनमोर घाटी के पास कच्ची सड़क पर पहुंचा, चालक परिमल ने वाहन को लापरवाही और तेज गति से चलाया, जिससे ट्रैक्टर पलट गया। इस भीषण हादसे में मुन्नी देवी और रामकली की मृत्यु हो गई, जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।

मृतकों के परिजनों और घायलों ने मुआवजे के लिए दावा किया। चौथे मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT), मुरैना ने मामले की सुनवाई करते हुए बीमा कंपनी को दायित्व से मुक्त तो कर दिया, लेकिन 'पे एंड रिकवर' का सिद्धांत लागू किया। यानी, कंपनी को पहले पीड़ितों को भुगतान करना था और बाद में वाहन मालिक से उसकी वसूली करनी थी। इसी आदेश के खिलाफ नेशनल इंश्योरेंस कंपनी ने हाई कोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।

पक्ष-विपक्ष के वकीलों के तर्क

बीमा कंपनी की ओर से वकील श्री एस.एस. बंसल ने तर्क दिया कि ट्रैक्टर-ट्रॉली में सवार यात्री 'मुफ्त यात्री' (Gratuitous Passengers) थे। चूंकि वाहन मालिक पूरन सिंह ने इन यात्रियों के लिए कोई अतिरिक्त प्रीमियम नहीं भरा था, इसलिए बीमा कंपनी किसी भी तरह के भुगतान के लिए उत्तरदायी नहीं है। उन्होंने 'श्रीराम जनरल इंश्योरेंस बनाम हबीब खान (2025)' के फैसले का हवाला देते हुए 'पे एंड रिकवर' के आदेश को गलत बताया। 

• इस सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों (श्रीमती पट्टी, संजय, श्रीमती छोटीबाई, और अन्य) की ओर से कोई भी उपस्थित नहीं हुआ। 

न्यायालय का फैसला

इस मामले की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति जी.एस. अहलूवालिया की एकल पीठ ने की। न्यायमूर्ति अहलूवालिया ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह मुद्दा अब कोई विवाद का विषय नहीं रह गया है (res integra)। न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनीता बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी (2025) और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी बनाम बलजीत कौर जैसे मामलों में दिए गए निर्णयों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि भले ही पॉलिसी 'केवल लायबिलिटी' (Liability Only Policy) हो और मुफ्त यात्रियों के लिए प्रीमियम न दिया गया हो, फिर भी पीड़ितों के हितों की रक्षा के लिए 'पे एंड रिकवर' का सिद्धांत लागू किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने पाया कि मुरैना न्यायाधिकरण (MACT) ने 'पे एंड रिकवर' का सिद्धांत लागू करके कोई कानूनी गलती नहीं की है। उच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण के 11 अगस्त 2008 के मूल आदेश की पुष्टि की और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी द्वारा दायर सभी पुनरीक्षण याचिकाओं और अपीलों को खारिज कर दिया।

खबर का सबक

इस मामले की सबसे प्रमुख बात यह है कि न्यायपालिका ने पीड़ितों के मानवीय अधिकारों को तकनीकी बीमा नियमों से ऊपर रखा है। कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि दुर्घटना के शिकार निर्दोष लोगों को मुआवजे के लिए वाहन मालिक के पीछे न भटकना पड़े। बीमा कंपनी (जिसके पास संसाधन हैं) पहले भुगतान करेगी और फिर वह स्वयं वाहन मालिक से कानूनी रूप से उस राशि को वसूलने की हकदार होगी।
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