आरक्षण का अधिकार भी एक्सपायर होता है, लाइफटाइम नहीं होता, High Court का डिसीजन पढ़िए

Updesh Awasthee
जबलपुर, 7 फरवरी 2026
: हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश ने निर्मला चौहान बनाम मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय मामले में स्पष्ट कर दिया कि, सरकारी नौकरी के लिए आरक्षित जाति के उम्मीदवारों को न्याय की मांग टाइम लिमिट में करनी चाहिए। टाइम लिमिट भी जाने के बाद "विधि द्वारा निर्धारित अधिकार" का अधिकार समाप्त हो जाता है। 

निर्मला चौहान बनाम मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय मामले की कहानी

यह मामला जिला सीहोर में भृत्य (Peon)/चौकीदार/वाटरमैन/माली के पदों के लिए 31 अक्टूबर 2015 को जारी विज्ञापन से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता निर्मला चौहान, जो अनुसूचित जनजाति (ST) महिला श्रेणी से आती हैं, ने भृत्य पद के लिए आवेदन किया। परीक्षा में उन्होंने 20 अंक प्राप्त किए और अनंतिम चयन सूची में उनका नाम तीसरे स्थान पर था। विवाद तब उत्पन्न हुआ जब अंतिम चयन सूची जारी हुई। सीहोर जिले में अनुसूचित जनजाति (महिला) के लिए कोई पद आरक्षित नहीं था, लेकिन अनारक्षित (UR) महिला श्रेणी के लिए तीन पद थे। 

अधिकारियों ने ST के स्थान पर OBC को नियुक्ति दे दी

इन तीन पदों पर दर्शना शर्मा (25 अंक), अरणा राजोरिया (20 अंक) और रुचि विश्वकर्मा (17 अंक) का चयन किया गया। रुचि विश्वकर्मा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से थीं लेकिन उनका चयन अनारक्षित सीट पर हुआ था। निर्मला चौहान को केवल इसलिए बाहर कर दिया गया क्योंकि वह ST श्रेणी की थीं और अधिकारियों का मानना था कि उन्हें अनारक्षित महिला श्रेणी की सीट पर नहीं रखा जा सकता, भले ही उनके अंक अंतिम चयनित उम्मीदवार (रुचि, 17 अंक) से अधिक थे। 

याचिकाकर्ता ममता चौहान के वकील श्री देवेंद्र कुमार त्रिपाठी के तर्क:
• चयन सूची भेदभावपूर्ण और मनमानी है क्योंकि निर्मला ने अनारक्षित श्रेणी की अंतिम उम्मीदवार से अधिक अंक प्राप्त किए हैं।
• विज्ञापन में ऐसी कोई शर्त नहीं थी कि आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार को केवल उसकी श्रेणी में ही माना जाएगा, भले ही उसके अंक अनारक्षित श्रेणी से अधिक हों।
• मेरिट (योग्यता) के आधार पर निर्मला को अनारक्षित महिला श्रेणी की सीट मिलनी चाहिए थी।

प्रतिवादी के वकील श्री पराग तिवारी के तर्क:
• महिलाओं के लिए आरक्षण 'क्षैतिज' (Horizontal) और 'कोशकीय' (Compartmentalized) है।
• सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के 10 फरवरी 1997 के परिपत्र के अनुसार, अनारक्षित पदों पर केवल सामान्य श्रेणी की महिलाओं की नियुक्ति हो सकती है।
• याचिकाकर्ता ने विज्ञापन की शर्तों को स्वीकार किया था और अब वह चयन प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकती (Estoppel का सिद्धांत)।
• उस समय के कानूनी मिसालों के अनुसार, क्षैतिज आरक्षण में एक श्रेणी से दूसरी श्रेणी में 'माइग्रेशन' (प्रवास) की अनुमति नहीं थी।

न्यायालय का निर्णय

न्यायालय ने मामले के कानूनी पहलुओं का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित निष्कर्ष दिए:
1. न्यायालय ने स्वीकार किया कि पहले का कानूनी रुख यह था कि क्षैतिज आरक्षण में माइग्रेशन संभव नहीं था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों (जैसे Airport Authority of India vs. Sham Krishna B) ने इसे बदल दिया है।
2. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 'ओपन कैटेगरी' कोई कोटा नहीं है, बल्कि यह सभी के लिए (महिला और पुरुष दोनों) उपलब्ध है और इसमें चयन का एकमात्र आधार मेरिट (योग्यता) होना चाहिए, चाहे उम्मीदवार किसी भी श्रेणी का हो।
3. न्यायालय ने माना कि निर्मला चौहान के साथ अन्याय हुआ था और उन्हें अनारक्षित महिला सीट पर मेरिट के आधार पर चुना जाना चाहिए था।

हालांकि निर्मला कानूनी रूप से सही थीं, लेकिन न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी क्योंकि:
1. परीक्षा को 10 वर्ष बीत चुके थे।
2. निर्मला ने चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति को चुनौती नहीं दी थी और न ही उन्हें इस याचिका में पक्षकार बनाया था।
3. प्रशासनिक निर्णय उस समय उपलब्ध कानूनी व्याख्या के आधार पर लिया गया था।

मामले की खास बात

इस मामले की सबसे विशेष बात यह है कि उच्च न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि याचिकाकर्ता मेरिट के आधार पर सही थी, लेकिन केवल समय के बीत जाने (10 साल की देरी) और प्रक्रियात्मक कमियों (चयनित उम्मीदवारों को पक्षकार न बनाना) के कारण उसे राहत नहीं मिल सकी। ।

इस मामले से सबक

1. यदि आपके अधिकारों का हनन होता है, तो कानूनी चुनौती तुरंत दी जानी चाहिए। अत्यधिक देरी (जैसे यहाँ 10 वर्ष) आपके मजबूत पक्ष को भी कमजोर कर सकती है।
2. चयन प्रक्रिया को चुनौती देते समय उन उम्मीदवारों को पक्षकार बनाना अनिवार्य है जिनके चयन पर आपके दावे का असर पड़ सकता है।
3. आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को यह समझना चाहिए कि यदि उनके अंक अनारक्षित श्रेणी के कट-ऑफ से अधिक हैं, तो वे अनारक्षित सीट के हकदार हैं, और इसके लिए उन्हें सजग रहना चाहिए।
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