पंचायत कर्मचारी ने कलेक्टर को उनकी लिमिट बताई, हाईकोर्ट ने भी समर्थन किया, मामला GWALIOR का

Updesh Awasthee
ग्वालियर, 7 फरवरी 2026
: मध्य प्रदेश की भितरवार जनपद पंचायत के कर्मचारी ने ग्वालियर कलेक्टर को उनकी लिमिट बता दी। हाई कोर्ट ने भी उनके तर्क का समर्थन किया और अपनी टिप्पणी में यह संदेश भी दिया है कि कलेक्टर को मर्यादा में रहना चाहिए। किसी अन्य अधिकारी के अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। 

टंटे की जड़, मामले का विवरण

यह कहानी सन 29 सितंबर 1998 से शुरू होती है। जब याचिकाकर्ता रमाशंकर माथुर को मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO), जनपद पंचायत, भितरवार (ग्वालियर) द्वारा सेवा में नियुक्त किया गया था। रमाशंकर माथुर एक तृतीय/चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। उनकी सेवा शर्तें 'मध्य प्रदेश पंचायत सेवा (भर्ती और सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1999' के तहत आती थीं। विवाद तब शुरू हुआ जब 25 अप्रैल 2013 को ग्वालियर के कलेक्टर ने रमाशंकर माथुर को एक आरोप पत्र (Charge Sheet) जारी कर दिया। यह आरोप पत्र 'म.प्र. सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1966' के तहत जारी किया गया था।

रमाशंकर माथुर ने इस आरोप पत्र को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उनके वकील, श्री डी.पी. सिंह ने तर्क दिया कि:
• याचिकाकर्ता पर पंचायत नियम लागू होते हैं, न कि सिविल सेवा नियम।
• नियमों के अनुसार, अनुशासनात्मक शक्तियाँ मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) के पास होती हैं, कलेक्टर के पास नहीं।
• कलेक्टर ने अपने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का उल्लंघन किया है।

कलेक्टर के पक्ष में सरकारी वकील के तर्क
राज्य की ओर से सरकारी अधिवक्ता श्री योगेश पाराशर ने तर्क दिया कि कलेक्टर जिले में पंचायत का प्रमुख होता है। उन्होंने 23 मई 1996 की एक अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा कि कलेक्टर को तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार दिया गया है।

ग्वालियर हाई कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

माननीय न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत ने मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट किया:
1. प्राधिकारी का महत्व: न्यायालय ने पाया कि रमाशंकर की नियुक्ति CEO द्वारा की गई थी, इसलिए अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार भी संबंधित पंचायत प्राधिकारी को ही होना चाहिए।
2. शक्तियों का दायरा: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि कलेक्टर को कुछ शक्तियाँ सौंपी गई थीं, लेकिन वे केवल निलंबन और लघु दंड देने तक सीमित थीं। गंभीर दंड के लिए आरोप पत्र जारी करने का अधिकार कलेक्टर के पास नहीं था।
3. उच्चाधिकारी का हस्तक्षेप: न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कानून किसी विशेष अधिकारी (जैसे CEO) को शक्ति देता है, तो कोई वरिष्ठ अधिकारी (जैसे कलेक्टर) भी उस शक्ति में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। 

न्यायालय ने माना कि कलेक्टर ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की थी। अतः, 25 अप्रैल 2013 के आरोप पत्र को रद्द (Quash) कर दिया गया। हालांकि, न्यायालय ने विभाग को यह छूट दी कि वे उचित कानूनी प्राधिकारी के माध्यम से फिर से कार्रवाई कर सकते हैं। 

इस मामले की खास बात, Hierarchy में बड़ा होना ही पर्याप्त नहीं

इस मामले की सबसे विशेष बात यह है कि यह "कानूनी प्रक्रिया की पवित्रता" को स्थापित करता है। न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रशासनिक पदानुक्रम (Hierarchy) में बड़ा होना ही पर्याप्त नहीं है; किसी भी कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए उस अधिकारी के पास वैधानिक शक्ति (Statutory Power) होनी अनिवार्य है। यह मामला एक नजीर है कि कोई भी वरिष्ठ अधिकारी केवल अपने पद के प्रभाव में आकर उन शक्तियों का प्रयोग नहीं कर सकता जो उसे कानून द्वारा स्पष्ट रूप से नहीं दी गई हैं। 
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