भोपाल समाचार, 9 फरवरी 2026: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, हमीदिया हॉस्पिटल में मरीजों के परिजनों से ठीक के मामले में, अस्पताल का मैनेजमेंट, पुलिस को सपोर्ट नहीं कर रहा है। जांच को सही दिशा में और तेज गति से आगे बढ़ाने में मदद नहीं कर रहा है बल्कि कुछ इस तरह की गतिविधियों की जा रही है ताकि पुलिस इस मामले की तह तक कभी पहुंच ना पाए।
हमीदिया अस्पताल में किस प्रकार की ठगी हो रही है
यहां भर्ती होने वाले मरीजों की तबीयत जैसे ही खराब होती है, उनके परिजनों के पास फोन आता है। फोन करने वाला खुद को डॉक्टर बताता है और यह भी बताता है कि मरीज की जान खतरे में है। फिर बाहर से दवाई के लिए पैसों की मांग की जाती है। अब तक की जांच में औसत ₹15000 प्रति व्यक्ति की डिमांड पाई गई है। फिर मरीज के परिजन को क्यूआर कोड भेजा जाता है और तत्काल पैसा ट्रांसफर करने के लिए कहा जाता है। यह सब कुछ इतनी तेजी से किया जाता है कि, अटेंडर के पास सोने का समय नहीं होता। उसकी आंखों के सामने मरीज की तबीयत बिगड़ रही होती है। इसलिए वह फटाफट पैसे भेज देते हैं।
इस मामले में अब तक क्या हुआ है
इंदौर पुलिस ने मामले के एक आरोपी जितेंद्र खागरे को गिरफ्तार करके भोपाल पुलिस को सौंप दिया है। जितेंद्र ने पूछताछ में बताया कि मरीज के परिजनों का मोबाइल नंबर अस्पताल के स्टाफ की तरफ से मिलता था। जिस समय मरीज की तबीयत बिगड़ रही होती है, और उधर फोन आता है। इसके कारण ठगी बहुत आसान हो जाती है। पुलिस का कहना है कि जितेंद्र बैतूल का रहने वाला है और उसे भोपाल पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा इंदौर से गिरफ्तार किया गया है। उसके बयान के आधार पर जांच को आगे बढ़ाने के लिए जितेंद्र के बयान के आधार पर अस्पताल के कर्मचारियों के बयान दर्ज करने हैं और उनका बैकग्राउंड स्टडी करना है।
हमीदिया अस्पताल के मैनेजमेंट ने अब तक 1400 आउटसोर्स कर्मचारी की डिटेल दी है लेकिन परमानेंट कर्मचारियों की जानकारी नहीं दी। अस्पताल अधीक्षक का कहना है कि यदि पुलिस मांगेगा तो हम डिटेल दे देंगे। जबकि असलियत यह है कि पुलिस डिटेल मांग चुकी है। अस्पताल अधीक्षक में जानबूझकर कर्मचारियों को अलग-अलग भागों में विभाजित करके केवल आउटसोर्स कर्मचारी की जानकारी भेजी है।
इसके कारण अस्पताल अधीक्षक का कार्यालय भी शक के दायरे में आ गया है। इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अस्पताल अधीक्षक कार्यालय का कोई अधिकारी इस मामले में शामिल हो। कोई बड़ा डॉक्टर भी हो सकता है जिसको बचाने के लिए, इन्वेस्टिगेशन को मिस गाइड करने की कोशिश की जा रही है।

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