नई दिल्ली, 11 फरवरी 2026: भारत की सड़कों पर दौड़ते लाखों ट्रक अब न केवल देश की अर्थव्यवस्था का पहिया घुमा रहे हैं, बल्कि अपनी हर यात्रा के साथ कार्बन का हिसाब-किताब भी दर्ज करेंगे। हाल ही में स्मार्ट फ्रेट सेंटर इंडिया, TERI और IIM-Bangalore द्वारा संयुक्त रूप से जारी एक महत्वपूर्ण व्हाइटपेपर, "Institutionalizing Freight Emissions Accounting in India", ने देश के लॉजिस्टिक्स सेक्टर के लिए एक नई दिशा निर्धारित की है।
सटीक डेटा: डीकार्बनाइजेशन की पहली शर्त
क्लाइमेट के पत्रकार श्री निशांत सक्सेना ने बताया कि, इस रिपोर्ट का मुख्य आधार यह है कि "जिसे मापा नहीं जा सकता, उसे घटाया भी नहीं जा सकता।" अब तक भारत का फ्रेट सेक्टर, जो तेजी से बढ़ रहा है, डेटा की कमी और बिखरी हुई पद्धतियों के कारण केवल अनुमानों पर टिका था। यह नया व्हाइटपेपर एक राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित फ्रेमवर्क का प्रस्ताव देता है जो ISO 14083 और GLEC जैसे वैश्विक मानकों पर आधारित है, लेकिन इसे भारतीय ईंधन मिश्रण और संचालन की वास्तविकताओं के अनुसार ढाला गया है। स्मार्ट फ्रेट सेंटर इंडिया की टेक्निकल प्रमुख, दीपाली ठाकुर के अनुसार, ये भारत-विशेष एमिशन फैक्टर नीति निर्माण को 'अनुमान' से निकालकर 'सटीक हस्तक्षेप' की ओर ले जाएंगे।
केवल कार्बन ही नहीं, ज़हरीली हवा पर भी वार
रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि फ्रेट एमिशन केवल CO₂ तक सीमित नहीं है। लॉजिस्टिक्स हब और कॉरिडोर के आसपास NOx, SOx, पार्टिकुलेट मैटर और ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक शहरी हवा को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। यही कारण है कि CAQM जैसे संस्थान दिल्ली-NCR जैसे हॉटस्पॉट को एक मॉडल के रूप में देख रहे हैं, जहां के सफल प्रयोगों को देशभर के औद्योगिक क्लस्टर्स में लागू किया जा सकता है।
रणनीतिक बदलाव और भविष्य की तैयारी
वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने भी स्पष्ट संकेत दिए हैं कि एमिशन लेखांकन को अब लॉजिस्टिक्स दक्षता और प्रतिस्पर्धा से अलग नहीं देखा जा सकता। भविष्य के लिए कुछ महत्वपूर्ण समाधान पेश किए गए हैं:
• डिजिटल MRV (Monitoring, Reporting, and Verification) सिस्टम का कार्यान्वयन।
• इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) के लिए भारत-विशेष एमिशन फैक्टर का निर्धारण।
• Transportation Emissions Measurement Tool और TERI का क्लीन फ्रेट प्रोग्राम।
निष्कर्ष: भारत की जलवायु नीति में अब तक फ्रेट ट्रांसपोर्ट को परिधि पर रखा गया था, लेकिन यह रिपोर्ट इसे केंद्र में ले आई है। TERI का मानना है कि यह डेटा-आधारित दृष्टिकोण न केवल डीकार्बनाइजेशन के लिए जरूरी है, बल्कि भविष्य के कार्बन मार्केट्स में भारत की भागीदारी की मजबूत बुनियाद भी बनेगा। आने वाले समय में, सड़क पर चलता हर ट्रक अपना 'कार्बन फुटप्रिंट' साथ लेकर चलेगा, जो भारत की क्लीन लॉजिस्टिक्स नीति की एक नई कहानी लिखेगा।

.webp)