ALOK KHARE डिप्टी कमिश्नर के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी Quash, लोकायुक्त ने बिना बात का बतंगड़ बनाया था

Updesh Awasthee
जबलपुर, 28 जनवरी 2026
: मध्य प्रदेश शासन के लिए काम करने वाले वरिष्ठ आबकारी अधिकारी श्री आलोक खरे के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला, हाई कोर्ट द्वारा समाप्त कर दिया गया है। कोर्ट ने पाया कि लोकायुक्त ने बिना बात का बतंगड़ बना दिया था। कोर्ट ने यह भी पाया कि श्री आलोक खरे के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी देने वाले अधिकारी ने दिमाग का उपयोग ही नहीं किया। अभियोजन की मंजूरी के बाद शासन ने श्री आलोक खरे को सस्पेंड कर दिया था। हाई कोर्ट के ऑर्डर के बाद उनकी बहाली का रास्ता साफ हो गया है।

मामला क्या है? 

मामला (रिट याचिका संख्या 33484/2025) जिसे मीनाक्षी खरे (याचिकाकर्ता नंबर 1) और उनके पति आलोक खरे (याचिकाकर्ता नंबर 2) द्वारा दायर किया गया था। याचिकाकर्ता नंबर 2, जो उस समय इंदौर में सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर तैनात थे और वर्तमान में रीवा में उपायुक्त, राज्य आबकारी के रूप में कार्यरत हैं, के खिलाफ लोकायुक्त ने 2019 में आय से अधिक संपत्ति का मामला (Crime No. 238/2019) दर्ज किया था। 15 अक्टूबर 2019 को उनके ठिकानों पर छापेमारी की गई थी।

पक्षों के नाम और वकीलों की दलीलें:

याचिकाकर्ता: मीनाक्षी खरे एवं अन्य। इनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रकाश उपाध्याय के साथ श्री सिद्धार्थ शर्मा, श्री शुभम मनचानी और अन्य अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।
प्रतिवादी: मध्य प्रदेश राज्य (वाणिज्यिक कर विभाग) और लोकायुक्त। राज्य की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल श्री यश सोनी और लोकायुक्त की ओर से श्री अभिनव श्रीवास्तव ने पैरवी की।

याचिकाकर्ता के वकील श्री प्रकाश उपाध्याय की दलीलें

1. स्वतंत्र आय का दावा: याचिकाकर्ता नंबर 1 (पत्नी) एक योग्य वकील हैं और शादी से पहले से ही वकालत कर रही हैं। वे अपना स्वतंत्र आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करती रही हैं।
2. कृषि आय: याचिकाकर्ता नंबर 1 ने अपने माता-पिता से मिले उपहारों, बचत और बैंक ऋण से कृषि भूमि खरीदी थी, जिससे उन्हें पर्याप्त आय हुई, जिसे जांच एजेंसी ने मनमाने ढंग से गणना से बाहर कर दिया।
3. गणित का अंतर: यदि पत्नी की कृषि और व्यावसायिक आय को शामिल किया जाए, तो संपत्ति और आय के बीच का अंतर केवल 1.94% रह जाता है, जिसे 'आय से अधिक संपत्ति' नहीं माना जा सकता क्योंकि यह 10% की स्वीकार्य सीमा से बहुत कम है।
4. यांत्रिक आदेश: आबकारी आयुक्त ने भी अपनी रिपोर्ट में माना था कि आय और संपत्ति विभाग की जानकारी में थी, लेकिन मंजूरी देने वाले प्राधिकारी ने इसे नजरअंदाज कर दिया।

प्रतिवादी लोकायुक्त और मध्य प्रदेश शासन की दलीलें:

1. जांच का निष्कर्ष: लोकायुक्त ने दावा किया कि चेक अवधि (1998-2019) के दौरान याचिकाकर्ताओं की आय उनके ज्ञात स्रोतों से 88.20% अधिक पाई गई।
2. दस्तावेजों का अभाव: जांच के दौरान याचिकाकर्ता नंबर 1 अपनी वकालत की आय और मुवक्किलों के संतोषजनक विवरण नहीं दे पाई थीं।
3. कानूनी प्रक्रिया: राज्य ने तर्क दिया कि अभियोजन की मंजूरी को इस स्तर पर रिट याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती और इसे केवल मुकदमे (Trial) के दौरान ही उठाया जाना चाहिए।

न्यायालय का फैसला और टिप्पणी: 

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह द्वारा लिखे गए आदेश में अदालत ने याचिका को स्वीकार कर लिया। अदालत ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कहीं:
• अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी और मंजूरी देने वाले प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता नंबर 1 की स्वतंत्र व्यावसायिक पहचान को पहचानने से इनकार कर दिया और उन्हें केवल एक सरकारी कर्मचारी की पत्नी के रूप में देखा, जो अनुचित है।
• आयकर रिटर्न को सही माना जाना चाहिए। यदि पत्नी की आय और कृषि लाभ को शामिल किया जाता है, तो मंजूरी देने का कोई आधार नहीं बचता।
• अदालत ने पाया कि मंजूरी आदेश (Sanction Order) बिना दिमाग लगाए और बिना किसी ठोस कारण के यांत्रिक तरीके से पारित किया गया था, विशेष रूप से तब जब आबकारी आयुक्त ने इसके खिलाफ सिफारिश की थी। 

माननीय उच्च न्यायालय ने 4 अप्रैल 2025 के अभियोजन मंजूरी आदेश को रद्द कर दिया और इसके परिणामस्वरूप होने वाली सभी कार्यवाही को भी समाप्त (Quash) कर दिया। 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर की खंडपीठ, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और माननीय न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी शामिल थे, ने यह फैसला सुनाया। 
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