शोषण के विरुद्ध मौलिक अधिकार क्या है, जानिए- Fundamental Rights

भारतीय संविधान में नागरिकों को छः प्रकार के मौलिक अधिकार प्राप्त है। कानून के जानकार के अलावा आम आदमी को अपने मौलिक अधिकार को जानना अतिआवश्यक होता है। आज हम जिस अधिकार के बारे में बता रहे हैं वह अधिकार स्वतंत्रता के अधिकार का पूरक माना जाता है अर्थात व्यक्ति की आजादी तभी पूर्ण होती है जब वह किसी का गुलाम न हो।

दासता प्राचीन काल का एक कलंक माना जाता है। आज भी महिलाओं, निर्बल, गरीब,निर्धन लोगों को गुलाम बनाकर रखा जाता है। मानव दुर्व्यापार या जबर्दस्ती श्रम करवाना आज भी होता है। इसे बंधुआ मजदूरी भी कहते हैं। समय-समय पर इसको रोकने के लिए कानून भी बनाए गए लेकिन कुछ हद तक सफलता मिली, कुछ हद तक मिलना अभी बाकी है। भारतीय संविधान में क्या है शोषण के विरुद्ध संरक्षण का मौलिक अधिकार जानिए।

भारतीय संविधान अधिनियम, 1950 के अनुच्छेद 23 की परिभाषा

किसी भी भारत के नागरिकों या विदेश के नागरिकों को किसी भी प्रकार का जबर्दस्ती श्रम नहीं करवाया जायेगा एवं उसकी मर्जी के खिलाफ कोई कार्य करने के लिए मजबूर नहीं किया जायेगा न ही किसी भी प्रकार की बेगार, बालतश्रम, मानव व्यापार, बंधुआ मजदूरी करवाई जाएगी। किसी निम्न वर्गों के व्यक्ति जो हाथ में मैला ढोने या उठाने के लिए मजबूर किया जाएगा अगर कोई निजी व्यक्ति या राज्य सरकार ऐसा करती है तब यह असंवैधानिक होगा एवं अनुच्छेद 23 का उल्लंघन माना जाएगा।

शोषण के विरुद्ध का अधिकार का उल्लंघन कब नहीं होगा जानिए

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23(2) के अनुसार राज्य सरकार द्वारा लोक हित मे अनिवार्य सेवाओं में यह शर्ते लागू नहीं होगी अर्थात किसी शासकीय सेवक द्वारा बिना भेदभाव के करवाया गया कार्य शोषण के विरुद्ध उल्लंघन नहीं है। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article) :- लेखक ✍️बी.आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665

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