पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास, संवैधानिक है या असंवैधानिक, जानिए- Legal General Knowledge

किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री उस राज्य का वास्तविक प्रतिनिधि होता है और वह सत्ता पर रहता है तो राज्य की जिम्मेदारी उस रहती है एवं सत्ता से हटने के बाद उसका लोक-पद इतिहास का एक विषय हो जाता है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एक कानून बनाया गया है जिसमें कहा गया है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा अपने पद का त्याग करने के बाद भी सरकारी आवासो में रहना उत्तर प्रदेश मंत्री (वेतन भत्ते एवं विविध प्रावधान) अधिनियम 1981 की धारा 4(3) का उल्लंघन है। 

इसके बाद इस अधिनियम में संशोधित कर उत्तर प्रदेश सरकार ने 1997 में एक नियम बनाया उत्तर प्रदेश पूर्व मुख्यमंत्री आवास आवंटन नियम,1997. इस नियम में बताया गया था कि मुख्यमंत्रियों को V प्रकार के बंगले किराया अदा करने पर आवंटित किए जाएंगे इन नियमों को लेकर उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर की गई एवं क्या जजमेंट था सुप्रीम का जानते हैं।

लोक प्रहरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

उक्त मामले की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने 1997 के नियम को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि इसके प्रावधान उक्त अधिनियम,1981 की धारा 4(3) के प्रत्यक्ष रूप से प्रतिकूल थे अतः इन नियमों की 2016 में संशोधन कर दिया गया जिससे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अपने जीवनकाल के लिए सरकारी बंगले आबंटित किए जाने के लिए हक़दार हो गए उपर्युक्त अधिनियम की संशोधित धारा 4(3)के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अभिनिर्धारित किया गया था कि:- 

प्राकृतिक संसाधन, लोक-भूमि एवं लोक-माल जैसे कि सरकारी बंगले,आवास भी लोक संपत्ति है जो कि भारत देश के नागरिकों के लिए होते है। समानता का सिद्धांत जिसका आविर्भाव न्याय एवं निष्पक्षता न्याय से होता है, इसके वितरण या आबंटन में राज्य का पंथ-निर्देशक अवश्य होना चाहिए।

पूर्व में लोक-पद धारण करने के आधार पर लोक-संपत्ति के वितरण द्वारा लाभ देने का प्रभाव नागरिकों का एक पृथक वर्ग सृजित करना होगा। पूर्व में लोक-पद धारण करने वाले व्यक्ति एक बार जब पद त्याग देते है तो उनका सामान्य व्यक्ति से अन्तर करने के लिए कुछ नहीं रहता।

उनके द्वारा धारित किया गया लोक-पद इतिहास का विषय हो जाता हैं एवं यह युक्तियुक्त वर्गीकरण का आधार नहीं बन सकता हैं अर्थात पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास में रहना उच्चतम न्यायालय के निर्णय के बाद एक संवैधानिक अधिकार हैं। :- लेखक बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article) इसी प्रकार की कानूनी जानकारियां पढ़िए, यदि आपके पास भी हैं कोई मजेदार एवं आमजनों के लिए उपयोगी जानकारी तो कृपया हमें ईमेल करें। editorbhopalsamachar@gmail.com