आपराधिक मामलों में व्यक्ति के चरित्र को कब साक्ष्य के रूप में वैध माना जाता है, यहां पढ़िए Law of Evidence, 1872

पिछले लेख में हमने आपको बताया था कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 52 कहती है कि सिविल मामलो में दोष-मुक्ति या दोषसिद्धि के लिए व्यक्ति के आचरण को नहीं देखा जाता है, लेकिन दाण्डिक मामलों में आरोपी व्यक्ति या अन्य व्यक्ति के चरित्र को साक्ष्य के रूप में देख सकते हैं।

साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 53 की परिभाषा:-

दाण्डिक मामलों (आपराधिक मामलों) में यह धारा आरोपी व्यक्ति को यह कहने की स्वतंत्रता देती है कि वह अच्छे चाल चलन का व्यक्ति है। इसलिए साक्ष्य ना होने के बावजूद उसकी बात पर विश्वास किया जाए। लेकिन उसके अच्छे चरित्र के साक्ष्य से यह मतलब नहीं है कि उसने किसी अपराध को किया ही नहीं है। 

आरोपी व्यक्ति के अच्छे चरित्र को तब सुसंगत (वैध) माना जा सकता है जब तराजू के दोनों और बराबर का वजन है अर्थात स्पष्ट नहीं है कि आरोपी दोषी है या नहीं, तो निःसंदेह आरोपी के पूर्व जीवन में अच्छे चरित्र का व्यक्ति होने के बारे में परिसाक्षय किया जाएगा एवं उसका पूरा लाभ दिया जाएगा।

अर्थात इस धारा के अनुसार यह स्पष्ट हैं कि दाण्डिक मामलों में आरोपी या पीड़ित व्यक्ति के पूर्व चरित्र, आचरण को साक्ष्य के रूप में देखा जा सकता है कि वह पूर्व में कैसा व्यक्ति था पहले उसके कोई आपराधिक रिकॉर्ड थे या नहीं। :- लेखक बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article) इसी प्रकार की कानूनी जानकारियां पढ़िए, यदि आपके पास भी हैं कोई मजेदार एवं आमजनों के लिए उपयोगी जानकारी तो कृपया हमें ईमेल करें। editorbhopalsamachar@gmail.com


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