जबलपुर, 22 जून 2026: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (जबलपुर पीठ) में प्रदेश के वोकेशनल ट्रेनर्स (Vocational Trainers) के अधिकारों और उनके मानदेय (Remuneration) में विसंगति से जुड़ी एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई हुई। यह मामला राहुल सूर्यवंशी एवं अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य व अन्य (WP No. 1531 of 2025) के रूप में माननीय न्यायाधीश विशाल धगट की एकल पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जहां एक तरफ याचिकाकर्ताओं को अपने रिकॉर्ड दुरुस्त करने की अनुमति दी, वहीं दूसरी तरफ राज्य सरकार को अपना रुख स्पष्ट करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
मप्र के वोकेशनल ट्रेनर्स का 10 वर्षों का संघर्ष और अन्य राज्यों से तुलना:
यह बात उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश में व्यावसायिक प्रशिक्षक (Vocational Trainers) पिछले 10 वर्षों से मात्र ₹20,000 प्रति माह के सीमित वेतनमान पर अपनी सेवाएं देने को मजबूर हैं। ट्रेनर्स का सवाल है कि जब यह 'समग्र शिक्षा अभियान' के तहत एक ही केंद्रीय योजना है, तो अलग-अलग राज्यों में इसके क्रियान्वयन (Implementation) के मापदंड अलग कैसे हो सकते हैं?
जहां एक ओर हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों में वर्तमान में वोकेशनल ट्रेनर्स का वेतन बढ़कर ₹38,600 तक पहुंच चुका है, वहीं मध्य प्रदेश के ट्रेनर्स आज भी एक सम्मानजनक वेतनवृद्धि के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। शासन और प्रशासन के आला अधिकारियों को सैकड़ों बार अपनी जायज मांगों को लेकर ज्ञापन और निवेदन सौंपने के बाद भी जब कोई ठोस परिणाम नहीं निकला, तो निराश होकर ट्रेनर्स को न्यायपालिका की शरण लेनी पड़ी। अब प्रदेश के हजारों वोकेशनल ट्रेनर्स के लिए माननीय हाईकोर्ट ही एकमात्र आशा की किरण नजर आ रहा है।
सुनवाई की मुख्य बातें और कानूनी बहस:
1. मानदेय में ₹3,000 की विसंगति (Anomaly) का मामला
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता श्री शशांक शेखर और उनके सहयोगी श्री भूपेश तिवारी ने कोर्ट को अवगत कराया कि यह पूरी योजना मूल रूप से केंद्र सरकार की है। ट्रेनर्स के मानदेय का पूरा पैसा केंद्र सरकार द्वारा ही जारी किया जाता है।
वकीलों ने दलील दी कि केंद्र सरकार प्रति वोकेशनल ट्रेनर ₹23,000 की राशि स्वीकृत कर रही है, लेकिन इसके बावजूद मध्य प्रदेश राज्य सरकार द्वारा जमीनी स्तर पर काम कर रहे ट्रेनर्स को केवल ₹20,000 का ही भुगतान किया जा रहा है। इस ₹3,000 की सीधी विसंगति को लेकर कोर्ट में मुख्य रूप से तीखी बहस हुई।
2. प्रतिवादी (Respondent) के नाम और पते में संशोधन
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट के सामने एक तकनीकी सुधार की बात रखी। उन्होंने बताया कि रिकॉर्ड में प्रत्यर्थी क्रमांक-3 (Respondent No. 3) का नाम पहले 'काउंसिल' (Council) दर्ज था, जो कि अब बदलकर 'कॉरपोरेशन' (Corporation) हो चुका है। इसके पते और नाम के सुधार के लिए याचिकाकर्ता द्वारा एक अंतरिम आवेदन I.A. No. 7665/2026 दायर किया गया था।
3. माननीय न्यायालय का आदेश (Court's Order):
संशोधन आवेदन स्वीकार: कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए आवेदन (I.A. No. 7665/2026) को मंजूर करते हुए प्रतिवादियों की सूची (array of respondents) में सुधार करने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई से पहले यह आवश्यक सुधार हर हाल में पूरे कर लिए जाएं।
राज्य सरकार को समय: राज्य सरकार की ओर से उपस्थित सरकारी अधिवक्ता श्री सुमित रघुवंशी ने मामले में जवाब (Reply) दाखिल करने के लिए कोर्ट से समय मांगा। कोर्ट ने इस पर सहमति व्यक्त करते हुए राज्य सरकार को जवाब पेश करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
अगली सुनवाई कब?
माननीय न्यायाधीश विशाल धगट ने आदेश दिया है कि इस आवश्यक सुधार और राज्य सरकार के जवाब दाखिल होने के बाद, इस पूरे मामले को चार सप्ताह बाद अगली सुनवाई के लिए अदालत में दोबारा सूचीबद्ध किया जाए। शासन की वादाखिलाफ़ी और प्रशासनिक उपेक्षा का दंश झेल रहे प्रदेश के हजारों वोकेशनल ट्रेनर्स की नजरें अब न्याय के इस मंदिर और अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं।

.webp)