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घूंघट उठाने से लेकर कीचड़ में पत्थर मारने तक के अपराध पर FIR का प्रावधान है, पढ़िए

LEARN IPC SECTION 349-350

हमारे आस पास बहुत सी छोटी-छोटी घटनाएं होती है और हम इन घटनाओं को बहुत सामान्य सी बात समझकर छोड़ देते हैं लेकिन भारतीय दंड संहिता,1860 में मानव के साथ होने वाले कोई भी अमानवीय कृत्य को अपराध माना है। क्योंकि भारतीय संविधान में सभी को स्वतंत्रता का अधिकार दिया हुआ है, और अगर उनकी स्वतंत्रता में कोई रुकावट उत्पन्न करता है तो संविधान के उल्लंघन के साथ दण्ड संहिता में अपराध का भी प्रावधान है।

भारतीय दण्ड संहिता,1860 की धारा 349 की परिभाषा(सरल एवं स्प्ष्ट शब्दों में) :-

अगर कोई व्यक्ति अपने सामान्य बल के काऱण किसी व्यक्ति गतिमान, गति में परिवर्तन, गतिहीनता या किसी पदार्थ द्वारा गति में रुकावट उत्पन्न करना बल का अपराध होता है।

धारा 350 के अनुसार आपराधिक बल की परिभाषा:-

दण्ड संहिता की धारा 349 को स्पष्ट समझने के लिए धारा 350 की आवश्यकता है जानिए।
1. अगर कोई व्यक्ति नाव में बंधी हुई रस्सी को छोड़ दे उस नाव में कोई व्यक्ति बैठा है यह गतिमान का अपराध होगा।
2. कोई व्यक्ति घोड़े पर बैठ कर जा रहा है और अन्य व्यक्ति उस घोड़े को चावुक मार दे जिससे घोड़ा भावुक हो जाए और अपनी गति में परिवर्तन कर देता है तब यह गति-परिवर्तन का अपराध होगा।
3. कोई व्यक्ति पालकी या घोड़ा गाड़ी में बैठकर जा रहा है और अचानक कोई व्यक्ति आपराधिक उद्देश्य से उसको रोक दे तब यह गति-हीनता का अपराध होगा।
4. अगर कोई व्यक्ति सड़क पर चल रहा है और अन्य व्यक्ति आपराधिक उद्देश्य से उसे धक्का देता है तो यह गति में संस्पर्श का अपराध होगा।
5. अगर कोई व्यक्ति आपराधिक उद्देश्य से किसी गंदे पानी में पत्थर मरता है जिसके कारण किसी अन्य व्यक्ति असुविधा उत्पन्न हो गई है तो यह भी बल का अपराध होगा।
6. स्त्री की बिना इजाजत के किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा उसका घूंघट उठाकर देखना।
7. स्नान करने के पानी में आपराधिक उद्देश्य से उबला हुआ पानी डालना।
8. किसी व्यक्ति के ऊपर आपराधिक उद्देश्य से कुत्ते को झपटने के लिए भड़काना।
उपर्युक्त अपराध धारा 350 के अंतर्गत आपराधिक बल के अंतर्गत मान्य होंगे।

भारतीय दण्ड संहिता,1860 की धारा 350 के अंतर्गत दण्ड का प्रावधान:-

इस अपराध का दण्ड का प्रावधान धारा 352 में किया गया है, यह अपराध समझौता योग्य है उस व्यक्ति से जिसके लिए आपराधिक बल का प्रयोग किया है दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 320 की सारणी 1 के अनुसार। यह असंज्ञेय एवं जमानतीय अपराध होते हैं, इनकी सुनवाई का अधिकार किसी भी मजिस्ट्रेट को होता है। सजा- इस अपराध के लिए तीन वर्ष की कारावास या पाँच सौ रुपये जुर्माना या दोनों से दण्डित किया जा सकता है।  :- लेखक बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

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