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मॉब लिंचिंग से बचने किस स्तर तक का जवाबी हमला अपराध नहीं माना जाएगा, यहाँ पढ़िए / ASK IPC

मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हमला करना) इन दिनों एक बड़ा ही लोकप्रिय शब्द हो गया है। शायद पुलिस की लापरवाही या पक्षपात के कारण मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ती जा रही है। कई बार अफवाह के कारण जमा हुई भीड़ किसी निर्दोष नागरिक पर हमला कर देती है। भारतीय दंड संहिता की धारा 100 किसी भी भारतीय नागरिक को निजी सुरक्षा का अधिकार देती है। आज हम आपको बताएंगे कि मोब लिंचिंग की स्थिति में निजी सुरक्षा के अधिकार के तहत अपनी जान बचाने के लिए भीड़ पर किस स्तर तक का जवाबी हमला अपराध नहीं बल्कि क्षमा योग्य माना गया है।

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 106 की परिभाषा:-

एक उग्र भीड़ किसी व्यक्ति पर घातक हमला करती हैं, जिससे उस व्यक्ति को उस भीड़ से स्वयं की मृत्यु होने की आशंका है या वह अनुभव करता है कि मेरी मृत्यु हो सकती है। व्यक्ति उपयुक्त परिस्थिति में भीड़ पर अपनी जान बचाने के लिए हमला कर सकता है अगर जवाबी हमले में कोई निर्दोष बच्चे या किसी निर्दोष व्यक्ति की जान चली जाती है या अपहानि होती है तब उस व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के अंतर्गत आएगा और वह दोषमुक्त होगा।

उधरणानुसार:- मोहन पर एक भीड़ द्वारा आक्रमण किया जाता है, जो उसकी हत्या करने का प्रयत्न करती है।वह उस भीड़ पर गोली चलाये बिना निजी सुरक्षा के अपने अधिकार का प्रयोग किसी रूप से नही कर पा रहा है, और वह भीड़ में मिले हुए बच्चों को अपहानि करने की जोखिम उठाये बिना गोली नहीं चला सकता। यदि वह गोली चलता है जिसके कारण कोई भी बच्चे को या व्यक्ति को अपहानि होती है तो मोहन कोई अपराध नहीं करता है। बी. आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665 | (Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)

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