नागरिकता कानून: राज्य क्या कर सकते हैं ? | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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नागरिकता कानून: राज्य क्या कर सकते हैं ? | EDITORIAL by Rakesh Dubey

नई दिल्ली। संशोधित नागरिकता कानून को लेकर हो रहे देश भर में कानून के पक्ष और विपक्ष में प्रदर्शनों का दौर जारी है। इन विरोधाभासी प्रदर्शनों और उसके कारण विभिन्न विश्वविद्यालयों में हो रही हिंसा के मद्देनजर कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वाम मोर्चा सहित सभी विपक्षी दलों की बैठक बुलाई। इस बैठक से टीएमसी, शिवसेना और आम आदमी पार्टी समेत कई विपक्षी पार्टियों ने खुद को दूर रखा। इस बैठक में हिस्सा लेने से पहले ही मायावती और ममता बनर्जी ने मना कर दिया था। बसपा सुप्रीमो मायावती ने तो कांग्रेस पर धोखेबाजी का आरोप भी लगाया। जिन पांच राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने सूबों में नागरिकता संशोधन कानून लागू करने से इंकार किया है। इस इंकार की वैधानिकता पर सवाल खड़े हैं। 

देश के सुप्रीम कोर्ट नागरिकता संशोधन क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर फ़िलहाल रोक लगाने से इनकार कर दिया है। इस मामले में अगली सुनवाई 22 जनवरी को होगी। कानून के जानकारों का मानना है कि राज्य इस मसले को लेकर ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। दरअसल नागरिकता का मुद्दा संविधान की 7वीं अनुसूची द्वारा संघ सूची में आता है। ऐसा संशोधन सभी राज्यों पर लागू होता है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2019 को अपनी मंजूरी दे दी है अब तो,यह एक कानून बन गया है । आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित होने के साथ ही यह कानून लागू हो गया है। इस कानून के अनुसार हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के जो सदस्य 31 दिसंबर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए हैं और जिन्हें अपने देश में धार्मिक उत्पीड़न का सामना पड़ा है, उन्हें गैरकानूनी प्रवासी नहीं माना जाएगा, बल्कि भारतीय नागरिकता दी जाएगी। 

नागरिकता (संशोधन) विधेयक बुधवार को राज्यसभा द्वारा और लोकसभा द्वारा पारित किया गया था। कानून के मुताबिक इन छह समुदायों के शरणार्थियों को पांच साल तक भारत में रहने के बाद भारत की नागरिकता दी जाएगी। अभी तक यह समयसीमा 11 साल की थी।वस्तुत: भारत, राज्यों का एक संघ है। भारत के संविधान को विधायपालिका, कार्यपालिका और केंद्र तथा राज्यों के बीच वित्तीय शक्तियों में विभाजित किया गया है, जो संविधान को संघीय विशेषता प्रदान करता है जबकि न्यायपालिका एक श्रेणीबद्ध संरचना में एकीकृत है। भाग 11 में अनुच्छेद 245-255 केंद्र और राज्यों के बीच विधायी संबंधों के विभिन्न पहलुओं का आदान-प्रदान करता है। संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को सुरक्षित करने के लिए विभिन्न प्रावधान तय किए गए हैं।

सातवीं अनुसूची केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण प्रदान करती है। विधायी विषयों को प्रथम सूची (संघ सूची), द्वितीय सूची (समवर्ती सूची) और तृतीय सूची (राज्य सूची) में बांटा गया है।वर्तमान में, संघ सूची के अंतर्गत 100 विषय शामिल हैं जिसमें विदेशी मामलों, रक्षा, रेलवे, डाक सेवा, बैंकिंग, परमाणु ऊर्जा, संचार, मुद्रा आदि जैसे विषय शामिल हैं।राज्य सूची में 61 विषय शामिल हैं। जिनमें पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था, परिवहन, स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय सरकार, पेयजल की सुविधा, साफ-सफाई आदि जैसे विषय शामिल हैं।समवर्ती सूची में 52 विषय शामिल हैं। सूची में शिक्षा, वन, जंगली जानवरों और पक्षियों की रक्षा, बिजली, श्रम कल्याण, आपराधिक कानून और प्रक्रिया, सिविल प्रक्रिया, जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन, दवा आदि जैसे विषय शामिल हैं।

अनुच्छेद 245 अपनी कार्यकारी शक्तियों के प्रयोग से संबंधित कुछ मामलों में राज्यों को निर्देश देने के लिए केंद्र को शक्तियां प्रदान करता है।अनुच्छेद 249 राष्ट्रीय हित में राज्य सूची में एक विषय के संबंध में कानून बनाने के लिए संसद को शक्तियां प्रदान करता है।अनुच्छेद 250 के तहत, संसद जब राष्ट्रीय आपात स्थिति (अनुच्छेद 352 ) होती है तो संसद के हाथों में राज्य सूची से संबंधित मामलों पर कानून बनाने की शक्तियां आ जाती हैं।अनुच्छद 252 के तहत, संसद के पास दो या दो से अधिक राज्यों के लिए उनकी सहमति से कानून बनाने का अधिकार है।

अनुच्छेद 256-263 का संबंध केंद्र और राज्यों के बीच प्रशासनिक संबंधों के आदान-प्रदान से है। अनुच्छेद 256 यह बताता है कि संसद द्वारा बनाए गये कानूनों का अनुपालन सुनिश्चत करना प्रत्येक राज्य का कर्तव्य है।संविधान विशेषज्ञ मानते हैं कि "राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 पर अपनी मुहर लगाकर इसे क़ानून बनाया है। आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित होने के साथ ही यह क़ानून लागू भी हो गया है। अब चूंकि यह क़ानून संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत संघ की सूची में आता है. तो यह संशोधन सभी राज्यों पर लागू होता है और राज्य चाहकर भी इस पर कुछ ज़्यादा नहीं कर सकते।

वैसे कांग्रेस द्वारा बुलाई गई बैठक में 20 दलों के नेता शामिल हुए। इनमे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, राकांपा प्रमुख शरद पवार, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल, ए के एंटनी, के सी वेणुगोपाल, गुलाम नबी आजाद और रणदीप सुरजेवाला, माकपा के सीताराम येचुरी, भाकपा के डी राजा, झामुमो के नेता एवं झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, राकांपा के प्रफुल्ल पटेल, राजद के मनोज झा, नेशनल कांफ्रेस के हसनैन मसूदी और रालोद के अजित सिंह शामिल थे।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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