कोहिनूर से नटराज तक: भारत की विरासत वापसी की लड़ाई - सुधीर मिश्रा, शिवपुरी

Bhopal Samachar
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ब्रिटेन की महारानी कैमिला ने पिछले साल राजतिलक में कोहिनूर हीरा नहीं पहना। भारत के करोड़ों लोगों ने इसे अपनी जीत माना। लेकिन असली लड़ाई अब भी जारी है।

भारत एक ऐसा देश है, जिसकी सभ्यता और संस्कृति ने विश्व को ज्ञान, कला, विज्ञान और अध्यात्म के क्षेत्रों में प्रेरित किया। परंतु, साथ ही भारत को बीते हजार वर्षों में निरंतर विदेशी आक्रमणों, लूट और औपनिवेशिक शोषण का सामना भी करना पड़ा। यह लूट सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक अस्मिता को भी चोट पहुँचाने वाली थी। आज़ादी के बाद भारत एक मजबूत राष्ट्र के रूप में उभरा है, परंतु यह सवाल अब भी बना हुआ है—क्या भारत अपनी खोई हुई संपत्तियों और धरोहरों को वापस पा सकता है?

भारत पर पहला बड़ा हमला 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम ने किया था, जिसने सिंध को जीतकर विदेशी शासन की नींव डाली। इसके बाद महमूद गजनवी ने 17 बार भारत पर आक्रमण किया और सोमनाथ जैसे प्रसिद्ध मंदिरों को लूटकर अफगानिस्तान ले गया। 13वीं से 15वीं सदी के बीच गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक और लोदी वंश जैसे शासकों ने भारत में शासन करते हुए कई बार मंदिरों और नगरों को लूटा। अलाउद्दीन खिलजी ने दक्षिण भारत में चढ़ाई कर देवगिरि, वारंगल और चित्तौड़ जैसे समृद्ध राज्यों से सोना, रत्न आदि लूटे।

1398 में तैमूर लंग ने दिल्ली पर हमला किया और हजारों नागरिकों की हत्या कर राजधानी को खंडहर में बदल दिया। 1739 में नादिर शाह ने लाल किले से मयूर सिंहासन, कोहिनूर हीरा और अरबों रुपये मूल्य की संपत्ति लूटी। अहमद शाह अब्दाली ने भी कई बार आक्रमण कर पंजाब और दिल्ली को लूटा और हजारों लोगों को गुलाम बनाया। इसके बाद मुग़ल शासकों ने भारत पर शासन किया—हालाँकि वे स्थापत्य और प्रशासन में दक्ष थे, लेकिन भारी कर प्रणाली, सांस्कृतिक दमन, और असहमत विचारधाराओं को बलपूर्वक कुचलना आम बात थी।

1765 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की दीवानी प्राप्त हुई और यहीं से भारत में औपनिवेशिक लूट की शुरुआत हुई। ब्रिटेन ने भारत से कच्चा माल, टैक्स, अनाज और संपत्ति का भारी मात्रा में शोषण किया। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डॉ. उत्सा पटनायक के अनुसार, 1765 से 1938 के बीच ब्रिटेन ने भारत से अनुम IX0,0000 अनुमानित $45 ट्रिलियन मूल्य की संपत्ति लूटी, जो विश्व इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक लूट मानी जाती है।

भारत सरकार ने आज़ादी के बाद इस ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई के लिए कुछ प्रयास किए हैं। भारत सरकार द्वारा इस दिशा में निरंतर किए गए प्रयासों से वर्ष 2021 से 2023 के बीच अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों से 200 से अधिक सांस्कृतिक धरोहरें और मूर्तियाँ भारत वापस लाई गईं, जिनमें वर्ष 2023 में न्यूयॉर्क से 10वीं सदी की नटराज की मूर्ति, 12वीं सदी की बुद्ध प्रतिमाएँ, मंदिरों के शिल्पांकन आदि शामिल हैं।

कोहिनूर हीरे को वापस लाने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, लेकिन ब्रिटेन ने इसे लौटाने से अब तक इंकार किया है।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण के लिए मुआवजे की माँग भी समय-समय पर उठती रही है। सांसद और विद्वान डॉ. शशि थरूर जैसे लोगों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ब्रिटेन से औपनिवेशिक मुआवजा माँगने की ज़ोरदार वकालत की है। हालाँकि, भारत सरकार ने अब तक कोई औपचारिक दावा नहीं किया है।

ऐतिहासिक संपत्तियों की वापसी में कई जटिलताएँ हैं। पहला, अंतरराष्ट्रीय कानूनों में ऐतिहासिक लूट की स्पष्ट परिभाषा और समाधान नहीं है। दूसरा, ब्रिटेन और पश्चिमी देश सांस्कृतिक धरोहरों को "वैश्विक विरासत" बताकर उन्हें लौटाने से इनकार करते हैं। तीसरा, कई लूट और हस्तांतरणों के प्रमाण या दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं, जिससे वैधानिक दावा करना कठिन हो जाता है। चौथा, आम जनता में इस मुद्दे पर जागरूकता और दबाव की कमी है।

इस संबंध में विषय विशेषज्ञ इतिहासकार डॉ. अमिताभ घोष का मानना है कि मुगल काल में लूटे गए धन का दस्तावेजीकरण न होना बड़ी बाधा है। इस संबंध में उनका सुझाव है कि सरकार को यूनेस्को के माध्यम से वैश्विक दबाव बनाना चाहिए।

इसी प्रकार, अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण के अनुसार, 1970 के यूनेस्को कन्वेंशन को मजबूत करके ही देश की धरोहर कलाकृतियों की वापसी संभव है।

भारत सरकार देश के सम्मान और ऐतिहासिक न्याय की दिशा में कई ठोस कदम उठा रही है और भविष्य में और भी प्रभावी रणनीतियाँ अपना रही है, जैसे कि "प्राचीन भारतीय कला एवं संस्कृति" डिजिटल प्लेटफॉर्म, जो विदेशों में रखी भारतीय कलाकृतियों को ट्रैक करने में मदद करता है।

औपनिवेशिक विरासत के पुनर्मूल्यांकन के क्रम में ब्रिटिश साम्राज्यवादी प्रतीकों को हटाकर भारतीय संस्कृति-केंद्रित नाम दिए गए, जैसे "किंग्सवे" को "कर्तव्यपथ" किया गया। इंडिया गेट पर ब्रिटिश राज के प्रतीक *जॉर्ज पंचम की मूर्ति* की जगह नेताजी की प्रतिमा स्थापित की गई।

हाल ही में, भारत ने जी-20 शिखर सम्मेलन 2023 में "वैश्विक दक्षिण" (Global South) के मुद्दों को प्रमुखता से रखा, जिसमें औपनिवेशिक शोषण का प्रभाव भी शामिल था।

भारत को औपनिवेशिक लूट के लिए मुआवजे का दावा करने हेतु संयुक्त राष्ट्र में एक विशेष टास्क फोर्स गठित कर सकता है (जैसा कि कैरिबियन देशों ने दासता के लिए किया है)। 

यूके, फ्रांस और पुर्तगाल के साथ सांस्कृतिक संपत्ति वापसी समझौते पर बातचीत की जा सकती है। जनजागरण और शैक्षणिक पहल के लिए स्कूली शिक्षा में औपनिवेशिक शोषण और भारत के आर्थिक नुकसान को विस्तार से पढ़ाया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानूनी अड़चनें दूर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र में "ऐतिहासिक न्याय" के लिए नए नियम बनवाने का दबाव बनाना, पश्चिमी देशों का प्रतिरोध खत्म करने के लिए अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ गठबंधन बनाकर सामूहिक मांग करना उचित लगता है।

सरकार ने प्रतीकात्मक परिवर्तनों (जैसे कर्तव्यपथ) और सांस्कृतिक विरासत की वापसी के माध्यम से देश के सम्मान को बढ़ाया है। ऐतिहासिक लूट की वित्तीय भरपाई के लिए कानूनी लड़ाई और वैश्विक गठजोड़ आवश्यक हैं।  

सरकार के प्रयासों को और प्रभावी बनाने के लिए *अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, ऐतिहासिक शोध और जनसमर्थन* तीनों की समन्वित आवश्यकता है।
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