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“नागरिक बोध” और नेतागिरी की कलगी | EDITORIAL by Rakesh Dubey

भोपाल। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने सच ही कहा था: ”स्वतन्त्र होने के बाद मेरा प्रथम कार्य राष्ट्र के लोगों को राष्ट्रभक्ति, अनुशासन व कर्त्तव्य पालन की सीख या उसका बोध कराना होगा।” कल भोपाल में जुड़े हम साठ पार लोगों का एक समूह इस विषय को लेकर चिंतित था | हमारी चिंता नर्मदा, कश्मीर, विधानपरिषद, प्रदेश में पिछली सरकार की आलोचना, प्रदेश की वर्तमान सरकार आगे चार साल में कैसे चले विषयक थी | यह चिंता होनी भी चाहिए थी, लेकिन सिर्फ चिंता करने से कुछ नहीं होता | 

जिस एक शब्द “नागरिक बोध“ के तले यह चिंता हो रही थी | उसके लिए पिछले सालों में इसकी–उसकी और न जाने किस -किस की सरकारों ने क्या किया ? हमें आलोचना करना चाहिए पर उसके पहले विचार और मंथन |मेरे सहित मेरे ह्म उम्र दोस्तों ने हाई स्कूल तक जो नागरिक शास्त्र पढ़ा है, उसमें नागरिक बोध का अर्थ है: अपने अधिकारों के पहले अपने कर्तव्यों को जानना। जिस प्रकार पानी, बिजली पर हमारा अधिकार है, तो उसका बिल अदा करना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि यह हमारी मजबूरी है। हम सड़क पर केले के छिलके, कागज आदि खुद तो फेंकते है और दूसरों को टोकते नहीं | सडक पर कचरा न फेंकना और दूसरे ऐसा करने से रोकना | नागरिक बोध है। गाँधी जी इसी प्रकार के नागरिक बोध के पैरोकार रहे हैं |

अब बात संविधान की| हमारे संविधान में प्रत्येक नागरिक को मूलभूत (मौलिक) अधिकार दिये गये हैं, इसके साथ ही कुछ कर्तव्यों का प्रावधान रखा गया है, जिसमें प्रमुख हैं: संविधान के प्रति निष्ठा, राष्ट्रीयगान एवं राष्ट्रीय ध्वज के प्रति सम्मान तथा राष्ट्रीय प्रेरकों, आदर्शों के प्रति सम्मान, भारत की प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा, राष्ट्र की सेवा, समस्त भारतीयों में भाईचारा एवं स्नेह को बढ़ावा देना, महिलाओं की गरिमा की रक्षा, संस्कृति को संरक्षण व सम्मान देना, प्राकृतिक पर्यावरण, वन तथा झीलों के प्रति संरक्षण का भाव, वैज्ञानिक सोच, मानवता, ज्ञानार्जन व चेतना रहा विकास तथा व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधियों में उत्कृष्टता लाना । आधे से अधिक भारतीय इसका पूरा पालन नहीं करते | सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो किसी ने इसके लिए कोई नागरिक प्रशिक्षण कभी आयोजित नहीं किया | स्कूल देश को नागरिक और साहब बनाते रहे | बड़े साहब बड़े स्कूलों से निकले | सरकारी स्कूलों से निकले कुछ बड़े साहब अपवाद स्वरूप है |

भारत में वर्तमान सरकार भाजपा की है ६ साल से | यह पहला नागरिक बोध-सफाई के लिए, फोटो सेशन नुमा वैसे ही कार्यक्रम चलाती है | जैसे पहले चलते थे | गाँधी जयंती के दिन हाथ में झाड़ू रख कर फोटो | भोपाल से निर्वाचित सांसद ने तो साफ़ कह दिया है सफाई उनका काम नहीं है | सच में सांसद, विधायक मंत्री और मुख्यमंत्री का सफाई का नाटक करना है | आम नागरिक का कचरा सडक पर होने पर जुर्माना होता है |नागरिक को पुलिस, कर विभाग, नगर निगम और अन्य सरकारी संस्थाएं चोर समझती है | देश का आम नागरिक, नागरिक बोध जैसी बात तब समझेगा जब वह अपराध बोध से मुक्त होगा |

राजनेता कोई भी रहे हों, उनकी आस्था और विश्वास नौकरशाही और खास कर धन या वोट कबाड़ देने वाले नौकरशाहों पर अधिक रहा है | मध्यप्रदेश में इन दिनों पिछली सरकार की आलोचना का मौसम है, साल भर गुजर गया है | पिछली सरकार जिन कारनामों से भ्रष्ट करार दी गई है, उसमे ये ही नवरत्न नौकरशाह थे | आज भी है | वक्त है बदलाव का नारा मध्यप्रदेश में साल भर में कुछ नहीं बदल सका है | ऐसा ही कुछ केंद्र में भी है |

सरकार नागरिकों को किसी प्रकार के नागरिक बोध का अहसास नहीं कराती जिस राजनीतिक दल को सरकार बनानी होती है वो सुनहरा सपना दिखाता है और नागरिक को मतदाता होने और अच्छे दिन आने का सपना दिखाता है | और सरकार बनते ही उसकी विनम्रता काईयांपन में बदल जाती है | चाहे मसला नर्मदा का हो में डूब में आरहे गावों के पुनर्वास का हो या काश्मीर में धारा 370 हटने के बाद वहां के छात्रों की मुश्किल का | मध्यप्रदेश सरकार के हाथ कुछ करने के लिए किसने बांधे हैं | हम नागरिकों ने तो कतई नही | अगर पिछली सरकार ने गलत शपथपत्र दिया है तो आप क़ानूनी कार्रवाई जब करना हो तब करना अभी तो डूबतों की जान बचाने की पहल कीजिये | याद रखिये, अब किसी भी दल के नेता हो, सता में इधर या उधर हो, पहले नागरिक है | नेतागिरी की कलगी तो नागरिक कभी भी नोंच देते हैं |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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