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इतनी जल्दी मत कीजिये, बैंकिंग विलय में ! | EDITORIAL by Rakesh Dubey

नई दिल्ली। बैंकों के निजीकरण और विलय की बातें जोरों पर हैं | वास्तव में यह समय विलय का नहीं बल्कि सार्वजनिक बैंकों के कामकाज की पारदर्शिता, प्रभावी विनिमयन और प्रभावी निगहबानी का है, जिससे बैंकों के बढ़ते एनपीए पर नियंत्रण हो सकें और जो खाते एनपीए (NPA) हो गये उनकी शीघ्र वसूली हो सकें। बैंकों का बढ़ता एनपीए गंभीर चिंता का विषय है जो बैंकों को समामेलित करने के लिए प्रेरित कर रहा है। 

एनपीए (NPA) के नुकसान की भरपाई के लिए सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की बैंकों में पूंजी डालकर थक चुकी है।  इसके बावजूद भी इस वित्तीय वर्ष में सरकार 70 हजार करोड़ की पूंजी के साथ-साथ अब वह कमजोर बैंक को दूसरी मजबूत बैंकों में मर्जर के मंसूबे भी बांध रही है। देश में बैंकों की संख्या कम होनी चाहिए। देश का काम सिर्फ 3 से 4 सरकारी बैंक, 3 से 4 प्राइवेट सेक्टर बैंक और एक या दो विदेशी बैंक से चल सकता है । शाखाओं का विस्तार हो सकता है | वैसे भी  अधिक बैंक होने से बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा होती है जिसका  लाभ माल्या और मोदी जैसे लोग उठाते है |

वास्तव में  इतने अधिक पब्लिक सेक्टर बैंकों की स्थापना के लिए लाइसेंस जारी करने के स्थान पर कुछ ही बैंकों की स्थापना की जानी चाहिए थी जिससे उन्हीं कम बैंकों का प्रबंधन आसानी से किया जा सकता था एवं उन पर निगरानी और नियंत्रण भी आसानी से रखा जा सकता था। बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा होने से बैंकों द्वारा ग्राहक की आर्थिक हैसियत और क्रेडिट रेटिंग का उचित विश्लेषण किये बिना लोन बांट दिए जाते हैं। बैंकों में आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण बैंक ऋण देने में सही व्यक्ति और सही परियोजना का चयन नहीं कर पाता है और जल्दबाजी में ऐसे ऋण स्वीकृत व वितरणहो जाते  हैं, जो कि एक या दो वर्षों में ही एनपीए में परिवर्तित हो जाते हैं। 

अब बैंकों को घाटे से उबारने एवं फंसे कर्ज की समस्या को दूर करने के ठोस उपायों में सरकार चाहती है कि बैंकों के विलय की प्रक्रिया को तेज गति से आगे बढ़ाया जाए। सरकार के मतानुसार बैंकों के अच्छे नियमन और नियंत्रण के लिए बैंकों का विलय जरूरी है। वित्त मंत्रालय के अनुसार बैंकों के विलय से बैंकों की दक्षता और संचालन में सुधार होगा। मोदी सरकार के पहले न्यू बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक में विलय हो चुका था। निजी बैंक रत्नाकर बैंक और श्री कृष्णा बैंक का केनरा बैंक में विलय हुआ था। 

आईएनजी वैश्य बैंक का कोटक महिंद्रा बैंक में विलय हुआ था। हमारे देश में बैंकों के विलय का पुराना रिकॉर्ड ठीक नहीं रहा है। न्यू बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब नेशनल बैंक का विलय, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का विलय, भारतीय स्टेट बैंक के सहयोगी बैंकों के विलय हमारे सामने उदाहरण है। भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा आईडीबीआई बैंक का अधिग्रहण किया गया है। सरकार ने 1 अप्रैल, 2019 को विजया बैंक और देना बैंक का बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय कर दिया है। इन बैंकों में फंसे हुए कर्ज की समस्या अन्य बैंकों के समान और अधिक बढ़ती गई। अब सरकार मेगा कंसॉलिडेशन प्लान के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के 110 बैंकों का विलय करके चार बड़े बैंक बना रही है।

पंजाब नेशनल बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स तथा यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का आपस में विलय, केनरा बैंक और सिंडिकेट बैंक का विलय, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में आंध्रा बैंक तथा कॉर्पोरेशन बैंक का विलय और इंडियन बैंक में इलाहाबाद बैंक का विलय कर रही है। इस बडी मर्जर योजना के पश्चात देश में 27 की जगह सिर्फ 12 सार्वजनिक बैंक रह जायेंगे। सरकार का कहना है कि बैंकों के विलय के पश्चात सरकारी बैंक मजबूत होंगे और वे अधिक राशि के ऋण देने के लिए सक्षम हो जायेंगे, जिससे सुस्त होती अर्थव्यवस्था को रफ़्तार मिलेगी और 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल हो जाएगा। इसके विपरीत विलय से बैंकों के जोखिम और अधिक बढ़ जाते हैं।

वास्तव में बैंकों का विलय एक पेचीदा मुद्दा है। बैंकों का विलय करने से फंसे कर्ज की वसूली नहीं हो पायेगी और बैंक प्रबंधन का पूरा ध्यान विलय के मुद्दे पर चला जाएगा। उदहारण सामने है स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में 5 सहयोगी बैंकों के विलय से कोई चमत्कार नहीं हुआ बल्कि 200 साल में पहली बार स्टेट बैंक को घाटा हुआ था। सरकार को इसमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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