भोपाल समाचार, 24 फरवरी 2026: सामान्य तौर पर इस तरह के घोटाले पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। ज्यादातर लोग तो मानने को तैयार नहीं होते कि ऐसा भी कोई घोटाला होता है लेकिन ऐसा हुआ है। मध्य प्रदेश के स्कूलों में 11,995 ऐसे शिक्षकों की नियुक्ति की जिनकी जरूरत ही नहीं है। सिर्फ एक साल में इनको 10 अरब से ज्यादा वेतन दिया गया। जबकि इन्होंने काम ही नहीं किया, यानी वेतन नहीं मिलना चाहिए था। यह खुलासा CAG रिपोर्ट में हुआ है।
CAG Report Exposes Over ₹10 Billion Teacher Posting Scam in Madhya Pradesh School Education
CAG REPORT जहां एक तरफ बताती है कि मध्य प्रदेश में 1 लाख से अधिक शिक्षकों की कमी है वहीं दूसरी ओर यही रिपोर्ट यह भी बताती है कि राजधानी भोपाल जैसे शहरी क्षेत्र में स्वीकृत पदों के मुकाबले बहुत अधिक मात्रा (108 प्रतिशत) में शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई है। शिक्षकों के स्थानांतरण और पदस्थापना, पदों के युक्तिकरण (Rationalization) के बिना और सरकारी आदेशों का उल्लंघन करते हुए किए गए।
शिक्षकों को प्रोबेशन अवधि (Probation period) के दौरान ही स्वैच्छिक आधार पर तबादले की अनुमति दे दी, जबकि नियमों के अनुसार उन्हें कम से कम तीन साल ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देना अनिवार्य था। इससे शहरी क्षेत्रों में शिक्षकों का जमावड़ा बढ़ गया।
CAG ऑडिट में पाया गया की स्कूल शिक्षा विभाग ने शासन के उन निर्देशों का जानबूझकर पालन नहीं किया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि यदि किसी जिले के शहरी क्षेत्र में शिक्षकों की संख्या अधिक है तो उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रांसफर कर दिया जाए।
भोपाल के ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षकों के 15% पद खाली है। जबकि शहरी क्षेत्र में 8% अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति कर दी गई है।
यह घोटाला कोई 1 साल का नहीं है बल्कि पिछले आठ वर्षों से पदों का कोई व्यापक युक्तिकरण नहीं किया गया। विभाग ने अतिशेष (Surplus) शिक्षकों को समायोजित किए बिना ही नए शिक्षकों की भर्ती भी जारी रखी।
राज्य में 6,954 प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल ऐसे पाए गए जहाँ छात्रों का नामांकन बहुत ही कम या शून्य था, लेकिन वहाँ 11,995 शिक्षक तैनात थे। रिपोर्ट के अनुसार, इन स्कूलों का युक्तिकरण न होने के कारण सरकार पर इन शिक्षकों के वेतन का परिहार्य (avoidable) वित्तीय बोझ पड़ा। इन शिक्षकों को अधिक छात्र संख्या वाले स्कूलों में तैनात कर संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता था। यदि एक शिक्षक का औसत वेतन ₹70000 मान लिया जाए तो सरकार ने 1 साल में इन शिक्षकों को दस अरब से ज्यादा वेतन दे दिया जबकि इन शिक्षकों से काम नहीं लिया।
हाई कोर्ट में कई मामलों में मध्य प्रदेश सरकार NO WORK NO PAY के लिए लड़ाई लड़ती है परंतु इस मामले में ऐसा कोई विचार भी नहीं किया गया।
दरअसल मध्य प्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग, एक ऐसा डिपार्टमेंट है जहां पर हर कदम पर भ्रष्टाचार और सरकारी खजाने का दुरुपयोग देखने को मिलता है। किसी एक स्कूल की दुर्दशा को हाईलाइट करके हजारों स्कूलों के लिए फंड जारी कर दिया जाता है। शिक्षकों की नियुक्ति और पदस्थापना के मामले में भी कई प्रकार की गड़बड़ी की जाती है।
भ्रष्टाचार और मनमानी की गुंजाइश के लिए तेजी से नियम बनाए जाते हैं लेकिन भ्रष्टाचार और मनमानी को खत्म करने के लिए कोई ड्राफ्ट तैयार नहीं किया जाता। हालांकि इस बार भी CAG ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं लेकिन यदि सरकार की मंशा ना हो और विपक्ष कमजोर हो, तो समस्याओं का कोई समाधान नहीं निकलता।

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