प्रथम अध्याय: श्रद्धालुओ! अब मैं आपको उस परम पावन धाम की कथा को सुनाता हूँ, जो कलयुग में समस्त पापों का नाश करने वाली और पुण्य प्रदान करने वाली है। मध्य प्रदेश के सिवनी मुख्यालय से लगभग 24 किलोमीटर की दूरी पर दिघौरी नामक एक अत्यंत पवित्र ग्राम है। इसी ग्राम में साक्षात महादेव 'श्री गुरुरत्नेश्वर' के रूप में विराजमान हैं। यह स्थान कोई साधारण स्थान नहीं है, अपितु यह द्विपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती महाराज की पावन जन्मस्थली है। भक्तों के कल्याण हेतु महाराज जी ने ही यहाँ विश्व के सबसे विशाल स्फटिक शिवलिंग की स्थापना करवाई है।
द्वितीय अध्याय:
अब मैं आपको बताता हूं कि, इस अद्भुत स्फटिक शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुई और इसकी स्थापना कब हुई? महादेव के चरणों में ध्यान लगाकर सुनिए, यह दिव्य शिवलिंग कश्मीर की बर्फीली वादियों से लाया गया है। वर्षों तक बर्फ की शीतल चट्टानों और पत्थरों के बीच दबे रहने के पश्चात इस दुर्लभ स्फटिक का निर्माण होता है। भारतवर्ष के प्राचीन धर्मग्रंथों में ऐसे स्फटिक शिवलिंग के पूजन का अत्यधिक महत्व बताया गया है। वर्ष 2002 में, माघ-फाल्गुन के मास में (15 से 22 फरवरी तक) एक विशाल मेले का आयोजन हुआ था। उस समय चारों पीठों के शंकराचार्य और अनेक धर्माचार्यों की उपस्थिति में, वैदिक मंत्रोच्चार के साथ इस भव्य शिवलिंग को स्थापित किया गया।
तृतीय अध्याय:
हे भक्तों! इस मंदिर की शोभा का वर्णन करना कठिन है। इस मंदिर का निर्माण दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली में किया गया है। मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने पर भक्त सबसे पहले एक विशाल हॉल में नंदी महाराज के दर्शन करते हैं। उसके पश्चात गर्भगृह में ज्योतिर्मय स्फटिक शिवलिंग के दर्शन होते हैं। जो भी श्रद्धालु सावन के मास में यहाँ आकर विशेष अनुष्ठान करते हैं और गंगाजल से महादेव का अभिषेक करते हैं, उनके जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं। मान्यता है कि इस स्फटिक शिवलिंग के मात्र दर्शन करने से ही मनुष्य को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
फलश्रुति: जो व्यक्ति इस कथा को सुनता है या सुनाता है, उसे भगवान शिव की भक्ति प्राप्त होती है। यद्यपि यहाँ पहुँचने के साधन सीमित हैं (जबलपुर मार्ग पर राहीवाड़ा से 8 किमी अंदर), फिर भी जो भक्त स्वयं के साधनों से कष्ट सहकर महादेव के दरबार में पहुँचता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। दूर-दूर के प्रदेशों से लोग अपनी श्रद्धा की कावड़ लेकर यहाँ आते हैं और अपनी झोलियाँ भरकर जाते हैं।
आचार्योपदेशावस्थिना विरचिता॥
इति श्रीदिघौरीमाहात्म्यकथा सम्पूर्णा॥
॥श्री गुरुरत्नेश्वर महादेव की जय॥
॥जगतगुरु शंकराचार्य महाराज की जय॥
ॐ नमः शिवाय।

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