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HOSTEL की GIRLS को भी आजादी का अधिकार: हाईकोर्ट | high court news

नई दिल्ली। केरल हाईकोर्ट (KERALA HIGH COURT) ने हॉस्टल (HOSTEL) में रहने वाली लड़कियों (GIRLS) पर हॉस्टल प्रबंधन द्वारा लगाए जाने वाले मनमाने नियमों (RULES) को अवैध (ILLEGAL) करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि यह लड़कियों (FEMALES) का निजी अधिकार है कि वो फिल्म का पहला शो देखना चाहतीं हैं या आखरी। कोर्ट ने यह भी कहा कि माता पिता की सहमति के बावजूद हॉस्टल प्रबंधन लड़कियों पर ऐसा कोई नियम नहीं थोप सकता जो उनकी आजादी (FREEDOM) को बाधित करता है। 

लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस ए. मुहम्मद मुस्ताक ने श्री केरल वर्मा कॉलेज से जुड़े गर्ल्स हॉस्टल के नियमों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पुरुष छात्रावासों में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है तो फिर महिलाओं के हॉस्टल पर क्यों। अदालत ने अंजिता के. जोस द्वारा दाखिल याचिका पर अपना यह फैसला दिया। अदालत ने कहा, ‘ऐसा प्रतीत होता है कि प्रबंधन की नैतिक इच्छा को छात्रावास में रहने वाली लड़कियों पर लागू करने का प्रयास किया जाता है। नैतिक पितृसत्ता एक ऐसी चीज है जिसे खत्म किया जाना चाहिए।’

उन्होंने कहा, ‘एक लड़की के पास लड़कों की तरह ही आज़ादी का समान अधिकार है। लड़कों के हॉस्टलों में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। यह छात्राओं पर निर्भर करता है कि वे फिल्म का पहला या दूसरा शो देखने जाती हैं या नहीं। यह हॉस्टल से बाहर का काम है।’ अदालत ने कहा कि कॉलेज शाम में वापसी का समय तय कर सकते हैं जो कि तर्कसंगत हो। हालांकि, समय का निर्धारण भी केवल हॉस्टल में अनुशासन लागू करने के उद्देश्य से होना चाहिए।

अदालत ने कहा, ‘देर से लौटने से हॉस्टल का माहौल खराब नहीं होगा। हॉस्टल में वापसी का समय तय करने का प्रबंधन के पास पूरा अधिकार है। जैसा पहले कहा गया है कि वह तर्कसंगत और केवल अनुशासन बनाए रखने के लिए होना चाहिए, किसी और उद्देश्य से नहीं।’

अदालत ने कहा, ‘तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कॉलेज की इस तरह की नैतिक इच्छा को दूसरों पर नहीं थोपा जा सकता है इसलिए इस नियम को खत्म किया जाता है।’ वहीं हॉस्टल वापस लौटने के मौजूदा समय शाम के 6:30 बजे को बदलने के छात्राओं के अनुरोध पर अदालत ने उनसे कहा कि वे कॉलेज के प्रिंसिपल के पास अपना पक्ष रखें।

याचिकाकर्ताओं की वकील सूर्या बिनॉय ने कहा कि हॉस्टल के नियम केंद्रीय अनुदान आयोग (रोकथाम, निषेध और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में महिला कर्मचारियों और छात्रों के यौन उत्पीड़न का निवारण) विनियम, 2015 के खंड 3.2 (13) का उल्लंघन करते हैं। इस नियम के तहत पुरुष छात्रों की तुलना में महिला छात्राओं की सुरक्षा के लिए छात्रावासों में महिलाओं के लिए भेदभावपूर्ण नियम लागू करने का हवाला नहीं दिया जाना चाहिए।

इसके साथ ही अदालत ने हॉस्टल के एक अन्य नियम को भी खत्म कर दिया जिसमें कहा गया था कि हॉस्टल का कोई भी सदस्य राजनीतिक बैठकों, प्रदर्शनों या प्रचार में सक्रिय रूप से भागीदारी नहीं कर सकता है। 

जस्टिस मुस्ताक ने कहा, ‘इस निर्देश का हॉस्टल में अनुशासन से कोई मतलब नहीं है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत हर व्यक्ति को अपना राजनीतिक विचार रखने का मौलिक अधिकार है। यह केवल छात्रावास के प्रबंधन के किसी उद्देश्य को हासिल करने के लिए उचित रूप से प्रतिबंधित किया जा सकता है।’ अदालत ने हॉस्टल के इस तर्क को खारिज कर दिया कि इन प्रतिबंधों को छात्राओं और उनके माता-पिता के हस्ताक्षर के आधार पर लागू किया गया है। 

अदालत ने कहा, ‘याचिकाकर्ता एक वयस्क है। माता-पिता की सहमति के आधार पर सवाल उठाने के उनके अधिकार के साथ समझौता नहीं किया जा सकता है। माता-पिता के हस्ताक्षर के बाद भी दिशानिर्देश मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं कर सकते हैं।’

हालांकि अदालत ने बिना वार्डन की अनुमति के कॉलेज समय के दौरान छात्राओं के हॉस्टल में न रहने के प्रतिबंध को बरकरार रखा। अदालत ने कहा, ‘कॉलेज हॉस्टल ऐसे छात्रों के लिए नहीं हो सकता है जो कि कॉलेज में न रहना चाहते हों।’