सत्ता में वंशवाद: श्रीराम और भरत के अंतर को समझना होगा | Editorial

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सत्ता में वंशवाद: श्रीराम और भरत के अंतर को समझना होगा | Editorial

प्रवेश सिंह भदौरिया। जब भी समाचार पत्रों या चैनलों पर "नेतापुत्र" शब्द प्रकट होता है तब अनायास ही रामायण का एक प्रसंग याद आ जाता है जिसमें श्री राम चंद्र को इस बात से तकलीफ होती है कि क्यों उन्हें सिर्फ इसलिए राजगद्दी मिले कि वो सभी भ्राताओं में अग्रज हैं?अतः जब कैकेयी की इच्छानुसार आयोध्या नरेश राजा दशरथ उन्हें राजतिलक के दिन ही वनवास जाने का आदेश सुनाते हैं तब ना केवल वो आज्ञा का पालन करते हैं बल्कि उसे सहर्ष स्वीकार भी करते हैंं।

14 वर्ष के वनवासी जीवन व्यतीत करने के उपरांत जब एक "राजकुमार" मर्यादा पुरूषोत्तम बन जाता है तब वे आयोध्या की राजगद्दी के लिए स्वयं को उचित पाता है। शायद ये किसी राजनीतिक वंशवाद का पहला उदाहरण था जिसमें "वारिस" ने स्वयं के लिए राजतिलक की जगह एक कठोर पैमाना चुना था। तो क्या श्री राम को वंशवाद के उदाहरण के रूप में याद किया जाना चाहिए? जबाब होगा बिल्कुल नहीं क्योंकि दशरथ का पुत्र होना राम के लिए राजा बनने की योग्यता नहीं बल्कि भरत के लिए योग्यता थी। इसलिए "वर्तमान" सर्वश्रेष्ठ राजाओं में भरत को याद नहीं रखता है। 

इसी प्रकार किसी व्यक्ति का किसी राजनेता का पुत्र होना उसके लिए "राजनीतिक महायज्ञ" अर्थात चुनाव लड़ने की योग्यता नहीं हो सकती है बल्कि यदि कोई अनेकों वर्ष से क्षेत्र में कार्य कर रहा है,जो निष्कलंक है उसको "नेतापुत्र" कहना उसकी मेहनत को तिरस्कृत करने के समान ही है।

हालांकि राष्ट्र एक पायलट को सिर्फ "विशेष पुत्र" होने की योग्यता के कारण प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर चुका है जो असल में वंशवाद का अकाट्य उदाहरण ही माना जायेगा। किंतु हमें किसी भी राजनेता के मेहनती पुत्र को उसी तरह से स्वीकार करना चाहिए जिस तरह से हम "चिकित्सक पुत्र" व "अफसर पुत्र" को करते हैं।

अतः वंशवाद का अर्थ समझने की आवश्यकता है कि क्या वो "श्रीराम" को सत्ता का उत्तराधिकारी बना रहा है या "भरत" को किसी राजा की संतान होने की योग्यता के कारण राजतिलक के रुप में जनता पर थोपा जा रहा है।
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