पराई पत्नि से यौन संबंध अब अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट का फैसला | IPC 497 SC

27 September 2018

नई दिल्ली। आज से पहले तक यदि एक पुरुष किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है, फिर चाहे वो महिला की सहमति या आमंत्रण पर ही क्यों ना हों, अपराध माना जाएगा। आईपीसी की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198 के तहत इसे व्यभिचार कहा जाता था। महिला का पति ऐसे पुरुष के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा सकता था। अपराध प्रमाणित होने पर 5 साल की जेल का प्रावधान था, लेकिन आज के बाद यह नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुरानी आईपीसी की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198 के तहत को समाप्त कर दिया है। 

अपने फैसले के लिए महिला स्वतंत्र है, पति उसका मालिक नहीं है
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 158 साल पुरानी व्यभिचार की धारा 497 (आईपीसी) को खत्म कर दिया। कोर्ट ने कहा कि व्यभिचार अपराध नहीं है। हालांकि, यह तलाक का आधार हो सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पति, पत्नी का मालिक नहीं है। महिला अपने फैसले खुद करने के लिए स्वतंत्र है। समाज जैसा चाहे महिला को वैसा ही सोचने के लिए नहीं कह सकता। हालांकि, व्यभिचार को सामाजिक बुराई ही मानना चाहिए।

धारा 497 को खत्म करते हुए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
व्यभिचार की धारा 497 समानता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
व्यभिचार से जुड़ी धारा 497 अतीत की निशानी है। अपने फैसले खुद करने का अधिकार गरिमामय मानव अस्तित्व से जुड़ा है। धारा 497 महिलाओं को अपने फैसले खुद करने से रोकती है।
यह धारा मनमानी और अतार्किक है। यह महिला के व्यक्तित्व पर दाग है।
केवल व्यभिचार अपराध नहीं माना जाना चाहिए। हां यह तलाक का आधार हो सकता है। 
एक पवित्र समाज में व्यक्तिगत मर्यादा महत्वपूर्ण है।
संविधान की खूबसूरती इसी में है कि इसमें- मैं, मुझे और तुम शामिल हो।
जो प्रावधान महिला के साथ असमानता का बर्ताव करता है वह असंवैधानिक है। वह संविधान को नाराज होने के लिए आमंत्रित करता है।
व्यभिचार तनावपूर्ण वैवाहिक संबंधों का कारण नहीं हो सकता है, लेकिन व्यभिचार तनावपूर्ण वैवाहिक संबंधों का नतीजा जरूर हो सकता है।
व्यभिचार चीन, जापान और ऑस्ट्रेलिया में अपराध नहीं है।

पहले क्या था?
158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 कहती थी- किसी की पत्नी के साथ अगर उसके पति की सहमति के बिना यौन संबंध बनाए जाते हैं तो इसे व्यभिचार माना जाएगा। इसमें सीआरपीसी की धारा 198 के तहत मुकदमा चलाया जाता था और इसमें अधिकतम पांच साल की सजा का प्रावधान था।

विरोध क्यों था?
आईपीसी की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198 के तहत व्यभिचार के मामले में सिर्फ पुरुष को ही सजा होती थी। याचिका में कहा गया था कि यह पुरुषों के साथ भेदभावपूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है। जब शारीरिक संबंध आपसी सहमति से बना हो तो एक पक्ष को जिम्मेदारी से मुक्त रखना इंसाफ के नजरिए से ठीक नहीं है।

अब क्या होगा?
अब कोर्ट ने आईपीसी की धारा 497 और सीआरपीसी की धारा 198 को खत्म कर दिया है। इसलिए व्यभिचार के मामलों में महिला और पुरुष, दोनों को ही सजा नहीं होगी। हालांकि, कोर्ट ने कहा है कि संबंधित महिला के पति या परिवार की शिकायत के आधार पर इसे तलाक का आधार माना जा सकता है।
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