प्रमोशन में आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट के आदेश का मप्र में फायदा नहीं होगा

06 June 2018

भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण की सशर्त अनुमति देकर केंद्रीय कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है, लेकिन मप्र के अधिकारियों और कर्मचारियों को फिलहाल ये राहत नहीं मिल पाएगी। इसके लिए राज्य सरकार को फिर सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा। विधि विशेषज्ञ कहते हैं कि केंद्रीय कर्मचारियों के परिप्रेक्ष्य में सुप्रीम कोर्ट ने प्रकरण विशेष में अंतरिम आदेश दिया है, जो राज्यों पर लागू नहीं होता है। यदि गाइडिंग प्रिंसिपल ऑर्डर होता तो राज्य सरकार पदोन्नति करने के लिए स्वतंत्र होती।

मप्र सहित चार राज्यों में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनावी बिसात बिछने से ठीक पहले केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों को पदोन्नति का तोहफा देने सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई। कोर्ट ने इस मामले में मंगलवार को अंतिम फैसला आने तक पदोन्नति जारी रखने के आदेश दिए हैं। इससे प्रदेश के कर्मचारियों में भी खुशी की लहर दौड़ गई। दो साल से कर्मचारी सशर्त पदोन्नति की मांग कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से इसके रास्ते खुल गए हैं। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अंतिम फैसले के अधीन पदोन्नति देने को कहा है।

55 हजार से ज्यादा कर्मचारी सेवानिवृत्त

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल 2016 को 'मप्र लोक सेवा (पदोन्नति ) अधिनियम 2002" खारिज किया है। तब से अब तक 55 हजार से ज्यादा कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इनमें करीब 22 हजार कर्मचारी ऐसे हैं, जिनकी पदोन्न्ति के लिए डीपीसी हो चुकी थी या डीपीसी की तैयारी चल रही थी। हर माह दो हजार से ज्यादा कर्मचारी सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

ये कहते हैं विधि विशेषज्ञ

पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता अजय मिश्रा कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ ने प्रकरण विशेष में कर्मचारियों के पदोन्नति के आदेश दिए हैं। यह गाइडिंग प्रिंसिपल ऑर्डर नहीं हैं। इसलिए राज्य सरकारें इस आधार पर कर्मचारियों की पदोन्नति नहीं कर सकती है। हां इस आदेश को आधार बनाकर राज्य सरकारें कोर्ट में अंतरिम व्यवस्था के लिए निवेदन कर सकती हैं।

पूर्व महाधिवक्ता रविनंदन सिंह कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है तो केंद्र के साथ राज्यों पर भी लागू होगा। हालांकि यह फौरी राहत है। वे कहते हैं कि इस आदेश से मिलने वाली पदोन्न्ति कोर्ट के अंतिम फैसले के अधीन रहेगी। सिंह कहते हैं कि वर्ष 2002 के पदोन्न्ति नियमों के तहत ही प्रदेश में पदोन्न्ति हो सकेंगी।

समीक्षा की जाएगी

जो भी निर्णय दिया है। कर्मचारी हित का फैसला है। स्वागत ही करना चाहिए। भ्रम की स्थिति में थे कर्मचारी। सबकी मंशा थी, जो भी फैसला हो वो आ जाए। सबको सर्वमान्य होगा। अभी आदेश नहीं देखा है। मुख्यमंत्री के स्तर पर समीक्षा होती है। आगे आने वाले समय को लेकर भी समीक्षा की जाएगी। 
लालसिंह आर्य, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार), सामान्य प्रशासन विभाग 

यह अंतरिम राहत है

इसे अंतरिम राहत कहा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने हमारी बातों को गंभीरता से लेते हुए फैसला दिया है। ये फैसला सभी राज्यों पर लागू होगा। 
विजय शंकर श्रवण, प्रवक्ता, अजाक्स

प्रदेश में लागू नहीं होगा

फैसला सिर्फ केंद्रीय कर्मचारियों के संबंध में है। इसे मप्र में लागू नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कानून के मुताबिक पदोन्नति देने को कहा है। मप्र की परिप्रेक्ष्य में देखें, तो हाईकोर्ट 'मप्र लोक सेवा (पदोन्नति ) नियम 2002" खारिज कर चुका है। जिसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई है। अब पदोन्न्ति की जाती है, तो 1998 के नियम से ही संभव है या फिर संविधान पीठ के फैसले का इंतजार करना पड़ेगा। 
केएस तोमर, अध्यक्ष, सपाक्स
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