माला दीक्षित/नई दिल्ली। आए दिन अदालतों में हड़ताल और अनियंत्रित होते आचरण पर उठते सवालों के बीच विधि आयोग वकीलों को अनुशासन के दायरे में लाने पर विचार कर रहा है। आयोग एडवोकेट एक्ट की समीक्षा कर रहा है। इसमें ये देखा जाएगा कि व्यावसायिक दुराचरण (प्रोफेशनल मिसकंडक्ट) के दोषी वकील को प्रेक्टिस से रोकने का अधिकार किसे है। वकील को डिबार करने का अधिकार अदालत को है कि नहीं।
वकीलों की हड़ताल के अलावा अदालत से दोषी करार व्यक्ति के सजा पूरी करने के दो साल बाद वकील के तौर पर पंजीकृत हो सकने का नियम भी विचार में दायरे में है। आयोग नये साल के पहले तिमाही में इस पर रिपोर्ट जारी कर सकता है।
वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार का ये मुद्दा आयोग को सुप्रीम कोर्ट ने भेजा है। कोर्ट ने वकालत के पेशे को नियमित और नियंत्रित किये जाने की जरूरत पर बल देते हुए एडवोकेट एक्ट के प्रावधानों पर तत्काल पुनर्विचार और समीक्षा की बात कही थी।
आयोग ने इस पर 22 जुलाई को सभी बार एसोसिएशनों और बार काउंसिलों से सुझाव मंगाए थे। जो कि लगभग आ चुके हैं। हालांकि बार काउंसिल आफ इंडिया ने जवाब के लिए कुछ समय मांग लिया है।
विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान कहते हैं कि एडवोकेट एक्ट की धारा 34 हाईकोर्ट को नियम बनाने का अधिकार देती है। ज्यादातर हाईकोर्ट ने नियम बनाए हैं। उन्हीं नियमों में कोर्ट वकीलों को डिबार करती है। इस पर देश भर की बार एसोसिएशनों, जजों और मुसिंफ मजिस्ट्रेटों आदि के विचार और सुझाव मिले हैं जिनमें मिली जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं।
ज्यादातर वकील संघों ने कोर्ट की ओर से वकीलों को डिबार करने का विरोध किया है। जबकि दूसरी ओर जजों की राय में अनुशासन जरूरी बताया गया है। जस्टिस चौहान कहते हैं कि एडवोकेट एक्ट की धारा 24ए पर भी विचार हो रहा है जो दोषी करार व्यक्ति को सजा पूरी होने के दो साल बाद वकील पंजीकृत करने की छूट देती है। यह नियम विचार के दायरे में है।
सुप्रीम कोर्ट एओआर एसोसिएशन के अध्यक्ष गोपाल सिंह एडवोकेट एक्ट और नियमों में वकीलों की अनुशासनहीनता पर लगाम लगाने को तो ठीक मानते है लेकिन डिबार करने का अधिकार कोर्ट को देने के वे खिलाफ हैं। उनका कहना है कि कोर्ट अपीलीय अथारिटी है। ये अधिकार जैसे अभी संबंधित बार काउंसिलों के पास है वैसा ही रहना चाहिए।
