युद्ध के मंडराते बादल

31 October 2016

राकेश दुबे@प्रतिदिन। पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। सीमावर्ती गांवों में निरंतर गोलाबारी से हालात मुश्किल होते जा रहे हैं। ऐसे हालात में भारत की प्रतिक्रिया भी तीखी होनी तय है। पाकिस्तान के तेवर कश्मीर में आतंकवादी बुरहान वानी के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद घाटी में बदले माहौल से एकदम बदल-से गए हैं। उसे वह बहाना मिल गया है, जिससे उसे लगता है कि वह लंबे समय की अपनी महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के कुछ करीब पहुंच सकता है। इसी मकसद से उसने कश्मीर के मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया और विश्व बिरादरी में एक फिजा तैयार करने की कोशिश की लेकिन उसे इन कोशिशों में अधिक फायदा नहीं मिला। इस बीच, भारत की ओर से भी इसकी प्रतिक्रिया होनी ही थी। भारत ने कड़ा रुख अपनाया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बलूचिस्तान और गिलगिट-बाल्टीस्तान में पाकिस्तानी फौज के दमन के मामले उठाए।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी ये मामले उठाए। इससे पाकिस्तान की बौखलाहट और बढ़ गई। उसने उरी के सेना के ठिकाने पर आतंकवादी हमला आयोजित करवा दिया। यह घटना बर्दाश्त के बाहर थी। जवाब में भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए पीओके में कई आतंकी शिविरों को ध्वस्त कर दिया, उसे पाकिस्तान नकारता रहा। मगर उसने उसके बाद सीमा पर लगातार गोलाबारी शुरू कर दी।

भारत की ओर से भी जवाबी कार्रवाइयां हुई हैं। इन कार्रवाइयों का मकसद शायद यह रहा है कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज आए लेकिन पड़ोसी देश इससे सबक लेने को तैयार नहीं है। उसने सीमा पर फौज की तैनाती बढ़ा दी है। भारत की ओर से भी ऐसी जवाबी तैयारियां शुरू हो सकती हैं किंतु यह समझना जरूरी है कि युद्ध कोई समाधान नहीं है। उससे दोनों देशों की आर्थिक प्रगति पीछे चली जाएगी। इसलिए इस दुश्चक्र से बाहर निकलने की दरकार है। 

दरअसल, पाकिस्तान को चीन की दोस्ती पर ज्यादा ही भरोसा है। वह इसी भरोसे में है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग करने की भारत के प्रयास कामयाब नहीं होंगे। भारत भी इस हालात को समझता है। इसलिए उसने कूटनीतिक पहल पर जोर देना कुछ कम कर दिया है। हालांकि कूटनीतिक पहल ही तमाम तनावों को हल करने का बेहतर तरीका है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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