जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुराचार के बालिग आरोपी की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी। यह टिप्पणी भी की कि अदालत को खेल या मजाक न समझें। रेप केस में सुलहनामा पेश करना गैरकानूनी है। न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी की एकलपीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पहले दुराचार का आरोप लगा और अब सुलहनामा पेश करके राहत चाही जा रही है, यह कानून को अपने हाथों की कठपुतली समझने की भारी भूल है।
न्यायमूर्ति राजेन्द्र महाजन की सिंगल बेंच में मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान राज्य शासन की ओर से पैनल लायर योगेन्द्र दास यादव ने अग्रिम जमानत अर्जी का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि सेशन कोर्ट ने झटका खाने के बाद आरोपी हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत हासिल करके संभावित गिरफ्तारी से बचने की कवायद में जुटा है। चूंकि उसने सरेंडर नहीं किया, अतः उसकी अर्जी खारिज किए जाने योग्य है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि आरोपी चन्द्रपाल बसेने ने बड़ी चालाकी से फरियादी पक्ष पर दबाब बनाकर या फिर प्रलोभन के जरिए अपने हक में सुलह का शपथपत्र तैयार करवाया है। लिहाजा, शपथपत्र का वेरीफिकेशन आवश्यक है। अग्रिम जमानत अर्जी तो खारिज की ही जाए, पुलिस को आरोपी के केस को प्रभावित करने के रवैये की भी जांच करने निर्देश जारी किए जाएं।
इच्छा से लगाए और वापस नहीं लिए जा सकते आरोप
खास बात यह रही कि हाईकोर्ट ने आरोपी के अलावा फरियादी पक्ष को भी आड़े हाथों लेते हुए टिप्पणी की कि यदि वाकई सुलहनामा हस्ताक्षरित किया भी गया है, तो ऐसा करना कानूनन गलत है। ऐसा इसलिए क्योंकि इच्छा या मनमर्जी से दुराचार जैसा संगीन आरोप लगाया और फिर वापस नहीं लिया जा सकता।
