राकेश दुबे@प्रतिदिन। संयुक्त राष्ट्र की भूख संबंधी सालाना रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में सबसे ज्यादा भुखमरी के शिकार भारतीय है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एएफओ) ने अपनी रपट ‘द स्टेट ऑफ फूड इनसिक्युरिटी इन द वर्ल्ड 2015’ में यह बात कही है। यह विचारणीय और चिंतनीय है कि खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर होकर भी हमारे देश में भूख से जूझ रहे लोगों की संख्या चीन से भी ज्यादा है। इसकी एक बड़ी वजह हर स्तर पर होने वाली अन्न की बर्बादी है क्योंकि हमारे यहां हर साल करोड़ों टन अनाज बर्बाद होता है।
संयुक्त राष्ट्र की फूड एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल दुनियाभर में करीब 1300 करोड़ कुंटल खाना किसी न किसी कारण बर्बाद हो जाता है। अमीर देशों में ग्राहक उतना खाना बर्बाद कर देते हैं जितना उप-सहारा अफ्रीका में उत्पादन होता है। स्थिति यह है कि विश्व में आठ में से एक व्यक्ति के पास पर्याप्त खाना नहीं है। जबकि चार-पांच साल पहले अनाज की बढ़ी कीमतों के कारण बारह देशों में दंगे हो गए थे और संयुक्त राष्ट्र को खाद्यान्न संकट पर सम्मेलन बुलाना पड़ा था।
भारत में जब तक अन्न के उत्पादन, भंडारण और वितरण की उचित व्यवस्था नहीं होगी, तब तक देश से कुपोषण और भुखमरी को खत्म नहीं किया जा सकता है |सरकारी आंकड़े यह दावा करते नहीं थकते हैं कि हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो गए हैं। सरकारी दावा को एक हद तक सही माना जा सकता है। लेकिन अन्न के भंडारण और वितरण का अवैज्ञानिक तरीका जहां एक तरफ अन्न के अभाव में भूख से मौत का तांडव करा रहा है, पर दूसरी तरफ हजारों टन अनाज उचित रखरखाव के अभाव में बर्बाद हो चुका है और हो रहा है। पिछले कुछ सालों में सरकारी नीतियों ने अन्न उत्पादन और वितरण पर ऐसी नीति अपनाई है कि देश के सामने खाद्यान्न सुरक्षा संकट में पड़ गया है। इस समय दुनिया भर में अस्सी करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें दोनों जून की रोटी मयस्सर नहीं होती। इन में से करीब चालीस करोड़ लोग भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हैं और यह तब हो रहा है, जब इन देशों में खाद्यान्नों के अतिरिक्त भंडार भी भरे पड़े हैं।
रिपोर्ट के अनुसार विश्वभर में में प्रतिदिन चौबीस हजार लोग किसी जानलेवा बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा भारत के हिस्से में आता है। भूख से मरने वाले इन चौबीस हजार में से अठारह हजार बच्चे हैं। इसमें छह हजार बच्चे भारतीय हैं। लेकिन अफसोस कि पिछले अड़सठ सालों में देश भर में इस बारे में कोई चिंता नहीं की गई। क्या संसद में इस संबंध में कोई बहस हुई?
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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