राकेश दुबे@प्रतिदिन। राज्य और केंद्र की योजनाये भले ही अलग अलग हो पर लाभ तो समाज को जाता है। केद्र सरकार का नीति आयोग उप समूह कुछ और करने जा रहा है जिसका लाभ नीचे तक न आकर सरकारी मशीनरी तक सीमित हो जायेगा। नीति आयोग द्वारा गठित मुख्यमंत्रियों के उपसमूह में इस बारे में मोटे तौर पर सहमति बन गई है। केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं के संख्या 72 से घटकर 30—40 कर दी जाये और इन परियोजनाओं में लचीले (फ्लेक्सी) कोष के हिस्से को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया जाये।
नीति आयोग में यहां उप समूह की बैठक के बाद उसके संयोजक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, ‘सीएसएस की संख्या कम करने तथा दो तरह की योजनाएं रखे जाने को लेकर व्यापक सहमति है| उप समूह की सिफारिशों को पांच जुलाई तक अंतिम रूप दे दिया जाएगा और इस पर सभी सदस्यों की सहमति लेने के बाद अंतिम रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपी जाएगी| इस फैसले से केंद्र प्रायोजित योजनाओं को दो व्यापक समूह में बांटा जाएगा| पहले समूह में राष्ट्रीय विकास एजेंडे से जुड़ी मनरेगा, स्वच्छ भारत मिशन तथा मध्याह्न भोजन जैसी प्रमुख योजनाएं होंगी| और दूसरे समूह में सामाजिक सुरक्षा सामाजिक समावेश से जुड़ी वैकल्पिक योजनाएं होंगी|
योजनाओं को दो भागों में विभाजित करने के आधार पर सीएसएस की संख्या 30 होगी और इनमे . केंद्र की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से कम नहीं होगी|
पहचान की गई प्रत्येक प्रमुख योजनाओं में सामान्य रूप से केंद्र राज्यों की जरूरतों के हिसाब से समान वित्त पोषण प्रतिरूप के साथ विभिन्न संघटकों वाले प्रमुख कार्यक्रम का क्रियान्वयन करेगा|सामान्य श्रेणी के राज्यों के लिए मुख्य योजनाओं के तहत केंद्र तथा राज्य के वित्त पोषण का अनुपात 60:40 होगा| जिन योजनाओं में केंद्र की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से कम होगी, वह उसी स्तर पर बरकरार रहेगी|
वैकल्पिक योजनाओं के तहत सामान्य श्रेणी के राज्यों के लिए वित्त पोषण को समान रूप से साझा किया जाएगा| लेकिन जिन योजनाओं में केंद्र की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से कम है, वह उसी स्तर पर कायम रहेगी| मूलभूत क्षेत्र की योजनाओं के तहत विशेष श्रेणी के 11 राज्यों के लिए केंद्र तथा राज्य हिस्सेदारी अनुपात 90:10 होगा जबकि वैकल्पिक योजनाओं के मामले में यह 80:20 होगा|
यह भी कहा गया है कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत सभी परियोजनाएं जिसमें 30 फीसद काम पूरा हो गया है, वित्त पोषण जारी रहना चाहिए| जिस साझेदारी प्रणाली के तहत परियोजना को मंजूरी मिली है, उसे मार्च 2017 तक जारी रखा जाना चाहिए| अगर परियोजनाएं उसके बाद भी अपूर्ण रहती है, राज्य को अपने कोष का उपयोग कर उसे पूरा करना होगा| यह भी कहा गया है कि ‘दृष्टिकोण 2022‘ को सच साबित करने के लिए गरीबी उन्मूलन, पेय जल, स्वच्छ भारत, ग्रामीण विद्युतीकरण, महिला एवं बाल स्वास्थ्य पोषण, सभी के लिए आवास तथा शहरी रूपान्तरण से संबद्ध योजनाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए| इसका व्यवहारिक पक्ष यह है की इससे कोई योजना कभी पूरी नहीं होगी और विकास का लुभावना सपना अभी राज्य के पीला में तो कभी केंद्र के पाले में चुनावी सुविधा के अनुरूप घूमता रहेगा।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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