रहली। रहली विकाखंड अंर्तगत आने वाले सपेरे जाति के परिवार के लोगों ने अपने नोनिहालों को कमाई का जरिया बना लिया है।मंहगाई के इस दौर में एक एक परिवार में दस से बारह बच्चे है और इसिलिये है ताकि अधिक से अधिक भीख मांगी जा सके। छोटे छोटे बच्चे तपती दोपहरी, कडकडाती ठंड और मूसलाधार बारिस में रहली गढाकोटा सहित अन्य तहसीलों में प्रतिदिन भीख मांकर लाते है जिससे परिवार का गुजारा होता है।
और इनके पिता दिन भर घर में पढे पढे आराम फरमाते है शाम को बच्चों से मिले पैसों की शराब पीकर गली मुहल्ले में गाली गलौच कर झगडा करते है। सच कहे तो यहां के रहवासियों के हालात दो की तरहा हो गये है।अशिक्षा, बेरोजगारी, जन संख्या वृद्धि, मूलभूत सुविधाओं का आभाव सब कुछ यहां देखने मिल जायेगा।
रहली से पांच किमी दूर टिकिटोरिया के पास बीडी श्रमिको के लिये बनी कुटीरों में अवैध कब्जा जमाये नाथ संप्रदाय के इन सपेरों का मूल कार्य अनादिकाल से सांप को पिटारा में रखकर लोगों को दिखाना और मिले चंद पेसों से परिवार का भरण पोाण चलता था। समय के साथ परंपरागत यह धंधा केवल नागपंचमी के दिन के लिये ही सिमट गया और ाासन ने भी प्रतिबंध लगा दिया जिसके चलते अब कोई काम नही रहा। अषिक्षा की वजह से षराब पीने की आदते पीडी दर पीडी चली आ रही है जिसके चलते नाथ सांप्रदाय के लोग कामचोरी करने लगे। आखिर पेट तो भरना ही है सो दर्जनों बच्चे पैदा कर भीख मांगने का धंधा शुरू करवा दिया। और खुद दिन भी ताा और अन्य उल्टै सीधे कामों में समय बिताना ष्षुरु कर दियां
नाथ संप्रदाय के यह सपेरे ग्राम कासल पिपरिया में बर्षों से रहते आ रहै है पिछले एक दषक पहले सपेंरों के करीब तीस परिवारों ने टिक्टिोरिया के नजदीक सरकारी जमीन पर कब्जा जमाकर रहने लगे थे पिछले सालों में श्रम विभाग द्वारा बनी 100 कुटीरों में कुछ विवकर्मा,लडिया और रैकवार समाज के लोागें ने कब्जा कर लिया बाकी कुटीरों में सपेरों ने डेरा डाल लिया यहां तक कि उन्होने दूर बसे अपने रितेदारों को भी बुलाकर कुटीरों में अवैध कब्जा करवा दियां। ।
दिन निकलते ही सपेरों के तीन साल से लेकर जवान हो चुके लडके और लडकियां बसों में बैठकर तो कुछ पैदल चलकर भीख मांगने निकल पढते है रहली गढाकोटा और देवरी के लिये।ााम ढलते ही घरों में लौटना होता है। घर लौटते समय आटा दाल चावल बगैरह लेकर जाते है तब जाकर खाना नसीब होता है। सपेंरों की बस्ती में जाकर चर्चा करने पर यहां के निवासियों ने बताया कि भीख मांगना हमारी मजबूरी है राकेष नाथ ने बताया कि हमारा तो पेतिृक धंधा ही भीख मांगना है सो बच्चों को बचपन से ही भीख मांगने की आदत डाल रहै है उनसे पूछा गया कि स्वयं मजदूरी पर क्यों नही जाते तो पूरे मुहल्ले के नषे में धुत लोग बोल एक साथ बोल पढे कि कोई हमें काम ही नही देता ना परमिट है ना जाब कार्ड कही कोई काम दिलवा दो। ष्
षराब पीकर परिवार के साथ मारपीट नही करने की समझाईस पर सहां की महिलायें लडने आ गयी कि तुम कोन होते हो हमारे पति से यह सब कहने वाले ये हमारे परिवार का आपसी मामला है।
शासन की अनेक योजनाओं के बाद भी सपेरों के इन बच्चों को पढाई नसीब नही हो पा रही है। औपचारिकता के लिये स्कूल में नाम तो लिखवा लिया है पर पढने नही जाते है। एैसा नही है कि यह बच्चे पढना नही चाहते पर अफसोस माता पिता भूख का हवाला देकर भीख मांगने पर मजबूर करते है जिससे इनका बचपन तो बरवाद होता ही है सारी जिंदगी अनपढ के अनपढ रह जाते है लडके बचपन से ही भीख में मिले पेसा हाथ में रहने के कारण बीडी सिगरेट और शराब के आदी होकर असमाजिक कार्यों में लिप्त हो जाते हैं और लडकियो का किशोर अवस्था में ही विवाह कर दिया जाता है सो जब तक कि विवाह ना हो जाये गली कूचों में भीख मांगने जाती है और मजबूरी के चलते अनेक हालातों का सामना करना पढता है।
इस संबंध में जनपद षिक्षा केंद्र के बीएसी आर सी मिश्रा से बात की गई तो उनका कहना है कि षिक्षा विभाग द्वारा नाथ संप्रदाय के इन लोगों को अनेको बार समझाया गया बमुष्किल बच्चों के नाम तो लिखवा दिया पर अब पढने नही भेजते वही किषोर वय लडकियों को आवासीय कन्या हास्टल में नाम दर्ज कराया पर आठ दस दिन में ही सभी लडकियां घर भाग गयी। ाासकीय योजनाओं से कोसों दूर इन सपेरों की हालत ारणार्थियों जैसी है घुमन्तु होने के कारण कही नाम जुडे है तो कही निवास है जिस कारण ाासकीय योजनाओं का ना ही ज्ञान है और ना ही कोई लाभ मिल पाता है। इन परिवारों में कुछ के नाम कासल पिपरिया तो कुछ के अन्य गांवों में है और जहां रहते है वह एरिया नगरपालिका क्षेत्र के अंर्तगत आता ह ैअब गांव जाते है तो निवास प्रमाण पत्र नही है और नगरपालिका से कोई लाभ लेना चाहें तो नगरपालिका की बोटर लिस्ट में नाम नही ह ैअब जाये ंतो जायें कहा।
वोट मांगने आये जनप्रतिनिधें से मामला हल कराने को कहा तो केवल वादे मिले ।ग्रामीण क्षेत्र के दौरे पर निकले रहली जनपद सीईओं राजेष पटेरिया को यहां के निवासी श्रीमति उमेदी बाई,हल्ले लडिया, और रामदयाल सहित मोहन आदि ने बताया कि यहां पर बिजली पानी और अनेक असुविधाओं से गुजरना पढ रहा है उन्होने बताया कि जनगणना वालों ने भी इनकी सुध नही ली। एक भी कुटीर में बिजली नही है। एक किमी दूर पानी लेने जाना पढता है।
कासल पिपरिया के सरपंच अजमेंर सिंह ने बताया कि लाख समझाने के बाद भी यह लोग अपने बच्चों को स्कूल पढने नही भेजते ाासकीय योजनाओं के लाभ की बात पर कहना है कि जो पहले गांव में लोग रहते थे उनका नाम जुडा है बाकी रिष्तेदार आकर बस गये है उनके संबंध में कोई जानकारी नही है। जहां तक बात मजदूरी की हे तो यह लोग जाब कार्ड बनने के बाद भी मजदूरी पर नही जाते इसलिये उनके कार्ड निरस्त हो चुके है। अलग अलग स्थानों पर नाम होने के कारण निवास प्रमाणित नही हो पाता ओर वोटर लिस्ट में नाम नही होने से पहचान नही हो पाती जिस कारण भी अनेक लोग षासकीय सुविधाओं से वंचित है।
श्रम विभाग को नही जानकारी।- टिकिटोरिया के नजदीक बनी श्रम विभाग द्वारा निर्मित एक सैकडा कुटीरों के संबंध में रहली बीडी श्रमिक चिकित्सालय को कोई जानकारी नही है एैसे ही सागर में संचालित केद्रीय चिकित्सालय में कुटीरों के संबंध में जानकारी चाही गयी तो अधिकरियों का कहना है कि हमें कोई जानकारी नही है। उन्हे नही पता है कि कब इन कुटीरों का निर्माण हुआ था कितनी कुटीरें बनी है ओर किनके लिये बनी हंे । कुटीरों के अर्लाट मेंट संबंध में भी कोई जानकारी नही मिल सकी। केंद्रीय चिकित्सालय सागर की प्रभारी मेडीकल चिकित्सा अधिकारी आर के बर्मा से फोन पर बात की गइ्र तो उन्होने इस संबंध में जानकारी नही होने की बात कही गई ।
योगेश सोनी
रहली सागर म.प्र