भोपाल। राज्यपाल रामनरेश यादव द्वारा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को विधानसभा सत्र के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किये जाने के बाद लिखे गये पत्र से प्रदेश की राजनीति नए चौराहे पर आ खड़ी हुई है। हर कदम के कई कई अर्थ निकलने वाले हैं और यह सबकुछ तब हो रहा है जब सीएम की जनआदशीर्वाद यात्रा चल रही है। अपने चंद्रगुप्त को संकट में देख चाणक्य (सुन्दरलाल पटवा) इस बार खुद ही मैदान में कूद गए और महामहिम को ही खरीखरी सुना डालीं।
भाजपा की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा द्वारा राज्यपाल को लिखे गये पत्र में वो सभी बाते कही गयी है, जो राज्य सरकार में रहते हुए उसके मुख्यमंत्री और मंत्री नहीं कह पा रहे। पटवा के पत्र के बाद यह तो साफ हो गया है कि राज्य सरकार विस सत्र को दोबारा बुलाने के कतई मूड में नहीं है। इधर विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी शनिवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिलने उनके निवास पर पहुंचे। इधर संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने राज्यपाल के पत्र के बाद विधि विशेषज्ञों से राय लेने की बात कही है।
कांग्रेस की ओर से राज्यपाल को सौंपे गये ज्ञापन और उसके वरिष्ठ नेताओं की मुलाकात के बाद जब राज्यपाल ने सीधे मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में अपना अभिमत दिया तो इसके मायने यह निकाले जा रहे है कि राज्यपाल चाहते है कि विधानसभा का सत्र पुन: आहूत किया जाए, जो शिवराज सरकार बुलाना नही चाहती।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी एवं संसदीय कार्य मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा से चर्चा के बाद पूर्व मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा भाजपा कार्यालय में सरकार का पक्ष सामने रखते नजर आए। उन्होंने राज्यपाल को लिखे पत्र की प्रति को मीडिया को उपलब्ध कराते हुए कहा कि राज्यपाल जैसे अंत्यत गरिमावान पद को राजनैतिक उपयोग का हथियार बनाया जा रहा है।
उन्होंने पत्र में लिखा है कि मुझे यह सुनकर दुख हुआ कि आपने मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्हें विधानसभा का सत्र लोकहित में पुन: आहूत करने की सलाह दी है और उसका आधार कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष एवं लगभग 66 विधायकों द्वारा हस्ताक्षरित ज्ञापन को बनाया गया है। पटवा ने लिखा है कि भारतीय संविधान में राज्यपाल मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद की सलाह से काम करते है, किन्तु अब सलाह देने का काम आपने अपना लिया है। यह संवैधानिक भूमिकाओं के ठीक उलटे दिया गया परामर्श है।
पटवा ने नेतापक्ष एवं कांग्रेस विधायकों की संख्या पर भी सवाल उठाये हैं। उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष एवं कांग्रेस विधायकों की संख्या कुल मिलाकर 64 होती है, जिसमें से चौधरी राकेश सिंह को हटाकर हस्ताक्षरों की संख्या अधिकतम 63 हो सकती हैं। पत्र में लिख गया है कि राज्यपाल के स्तर पर ऐसी भूलें भी उचित नहीं है। पटवा ने नेता प्रतिपक्ष की भूमिका को अत्यन्त संदिग्ध एवं अकुशल बताया है। उन्होंने कहा है कि नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने अपना प्रस्ताव प्रस्तुत करने का उप नेता प्रतिपक्ष द्वारा प्रस्तुत ना करने पर आपत्ति ना कर स्वयं ही दोषी होने का प्रमाण दिया है।
पटवा ने लिखा है कि आपके पत्र में नेता प्रतिपक्ष से आपकी भेंट का विस्तृत उल्लेख तो किया गया है, लेकिन स्वयं मुख्यमंत्री तथा स्पीकर से हुई भेंट और उसमें स्पष्ट किए गए तथ्यों तथा कानूनी पहलुओं के उल्लेख की चर्चा ही नहीं की गई है। यह स्थिति आप स्पीकर करेंगे कि सरासर एकपक्षीय प्रतीत होती है और विपक्ष को अनुचित अवसर देती है कि वह इसके विवरणों का इकतरफा तरीके से राजनीतिक लाभों के लिए दोहन कर सकें। पत्र में विधि विशेषज्ञों से परामर्श का उल्लेख करने की बात लिखी गयी है, लेकिन इस बात पर आपत्ति की है कि इसमें किसी पत्र को संलग्न नहीं किया गया है।
पटवा ने नेता प्रतिपक्ष और राज्यपाल के पत्र में संविधान के अनुच्छेद 174 (2) का उल्लेख करते हुए सदन सत्र पुन: आहूत करने की मांग का उल्लेख करते हुए आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा है कि मुझे आश्चर्य है कि नेता प्रतिपक्ष का संवैधानिक ज्ञान इतना भी नहीं है कि यह प्रावधान सत्र के अवसान के बारे में है, ना कि उसे आहूत करने के बारे में। पटवान ने पत्र में आग्रह किया है कि भेजा गया पत्र एक अभिमत मात्र की शैली में , फिर भी यह उचित होगा कि यह अभिमत भी तथ्यों के समुचित, समग्र और संवैधानिक रूप से पर्याप्त विश्लेषण के अभाव में तत्काल वापिस लिया जाये।