मध्यप्रदेश के इन्दौर शहर के बाणगंगा इलाके में हुए बलात्कारी बाप की हत्या के मामले में, मैं यहां पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई को चुनौती देना चाहता हूं। मैं यहां बताना चाहता हूं कि यह हत्या नहीं वध है और ऐसे मामलों में गिरफ्तार नहीं सम्मान किया जाना चाहिए।
इस सनसनीखेज हत्याकांड की कहानी टीवी के दर्शकों को ध्यान में होगी परंतु अखबारों की सुर्खियां शायद यह शुक्रवार को ही बन पाए। संक्षेप में बता देता हूं कि इन्दौर शहर के बाणगंगा इलाके में एक शराबी मजदूर हुकुम जगदाले की हत्या उसी के 16 वर्षीय नाबालिग बेटे ने इसलिए कर दी क्योंकि बाप, अपनी ही बेटी, अर्थात हत्यारोपी की बहन पर रेप करने की कोशिश कर रहा था और यह कोशिश वो लगातार कर रहा था। इस मामले में पुलिस ने नाबालिग बेटे सुनील एवं सुनील के मामा अजय व नानाजी कालूराम के खिलाफ धारा 302 के तहत प्रकरण दर्ज कर लिया है।
मैं यहां पुन: चुनौती देना चाहता हूं कि यह प्रकरण गलत दर्ज किया गया है एवं इस मामले में पुलिस ने अच्छी पुलिस की भूमिका नहीं निभाई।
कृपया घटना की परिस्थितियों पर गौर कीजिए। मृतक हुकुमचंद शराबी था एवं कई दिनों से अपनी बेटी पर रेप अटैम्ट कर रहा था। वो बार बार जान बचाकर भाग जाया करती थी। घटना की रात भी मृतक ने रेप अटैम्प किया और वो बचकर भागी। इसके बाद मृतक ने उसका पीछा किया और उसको बचाने आए कालूराम, अजय व अपने बेटे सुनील पर हमला भी किया।
एक शराबी, जो अपनी ही बेटी पर बलात्कार के लिए उतारू हो, को रोकने का हर संभव प्रयास किया गया लेकिन जब मृतक ने हमला शुरू किया तो अपनी बहन को बचाने के लिए भाई ने भी जवाबी हमला किया जिसमें हुकुमचंद की मौत हो गई।
अब आप ही बताइए क्या यह हत्या है। मेरा तर्क है कि यह हत्या नहीं वध है। हत्या और वध में पर्याप्त अंतर होता है और भारतीय संस्कृति के अग्रणी ग्रंथ गीता में इसका अंतर साफ समझाया गया है। जब अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा कि मैं मेरे ही परिजनों की हत्या के पाप से ग्रसित हो जाउंगा तब श्री कृष्ण ने कहा कि पापियों का नाश करना हत्या नहीं होता, उसे वध कहते हैं और वध का पाप नहीं लगता।
ये तो रही धर्मग्रंथ की बात। अब कानून की बात भी करते हैं, तो गीता के इस संदेश को भारतीय कानून ने भी मान्यता दी है और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 100 में यह स्पष्ट लिखा है कि यदि आप प्राणों की रक्षा के लिए किसी अपराधी पर जवाबी हमला करते हो तो यह क्षमा योग्य अपराध की श्रेणी में आता है और इसके लिए आपको संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं।
यहां मैं याद दिलाना चाहता हूं कि घटना के बाद इसकी सूचना भी पुलिस को उसी बालक ने दी जिसे पुलिस ने हत्या का अरोपी मानकर अरेस्ट किया है। सामान्यत: हत्यारे या अपराधी खुद पुलिस के सामने आकर सरेण्डर नहीं करते।
ये मामला हत्या का नहीं, एक मासूम बालिका को बलात्कार के बचाने के दौरान हुई दुर्घटनावश मृत्यु का है जो आईपीसी की धारा 100 के तहत दर्ज किया जाना चाहिए। पुलिस ने इसे धारा 302 के तहत गलत तरीके से दर्ज किया है और एक तरह से समाज के साथ अन्याय किया है। पुलिस की यह कार्रवाई लोगों को अपराध के खिलाफ आवाज उठाने और अपराधियों के हौंसले बढ़ाने वाली है।
पुलिस विभाग के मुखिया को चाहिए कि वो इस मामले की पुन: जांच कराएं, तेज जांच कराएं एवं एफआईआर में दर्ज धाराओं को बदलें। इस मामले के आरोपी बालक को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, सम्मानित किया जाना चाहिए और इसकी शुरूआत मैं कर रहा हूं। आशा है समाज के दूसरे वर्ग पुलिस भी ऐसा ही करेंगे।
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