नई दिल्ली, 1 सितंबर 2026: यदि कोई व्यक्ति किसी सहकारी समिति से, या फिर किसी भी प्रकार के समूह से इस्तीफा दे चुका है, लेकिन किसी कारणवश उसका नाम सदस्यों की लिस्ट में प्रकाशित हुआ है, तो क्या वह व्यक्ति प्रॉफिट अथवा प्रॉपर्टी में एक सदस्य होने के नाते अपने हिस्से का दावा कर सकता है? क्योंकि उसका नाम लिस्ट में मौजूद है। मामला आसान सा लगता है लेकिन यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक गया, और सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला किया। जो इस तरह के विवादों को हमेशा के लिए खत्म कर देगा।
विवाद की पूरी कहानी:
मूल दावेदार एस.एन. शर्मा ने मेसर्स बर्मा शेल को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में सदस्यता और भूखंड (plot) आवंटन का दावा किया था। यद्यपि मध्यस्थ (Arbitrator) और दिल्ली सहकारी न्यायाधिकरण (Tribunal) ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था, दिल्ली उच्च न्यायालय ने पाया कि मूल दावेदार ने 1951 में ही सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और उनका शेयर दूसरे सदस्य को ट्रांसफर कर दिया गया था। उनका नाम सदस्य सूची में केवल इसलिए दिख रहा था क्योंकि उनके ₹25 सस्पेंस खाते में पड़े थे। 1952 में उनके सदस्यता के नए आवेदन को खारिज कर दिया गया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों की इस अनदेखी को कानून की स्पष्ट भूल मानते हुए दोनों आदेशों को रद्द कर दिया था।
दोनों पक्षों के वकीलों के तर्क:
अपीलकर्ता के वकील (श्री जितेंद्र मोहन शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता): ने दलील दी कि उच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत अपनी 'सर्टिओरारी' (certiorari) और पर्यवेक्षी अधिकारिता की सीमा का उल्लंघन किया है। उन्होंने 'शालिनी श्याम शेट्टी बनाम राजेंद्र शंकर पाटिल' मामले का हवाला देकर कहा कि दोनों निचले मंचों के समवर्ती निष्कर्षों में दखल नहीं दिया जाना चाहिए था।
सोसाइटी के वकील (श्री असीम वच्छर, वरिष्ठ अधिवक्ता): ने तर्क दिया कि मध्यस्थ और न्यायाधिकरण ने रिकॉर्ड पर मौजूद महत्वपूर्ण साक्ष्यों (1951 का इस्तीफा, 1952 में सदस्यता का अस्वीकरण, और 1979 में जमा राशि का अस्वीकरण) को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया था। उन्होंने 'पासुपुलेटी वेंकटेश्वरलू' और 'राज कुमार डे बनाम तारापदा डे' जैसे मामलों का हवाला दिया।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय:
न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए शर्मा की अपीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि रिट क्षेत्राधिकार का दायरा सीमित है, लेकिन साक्ष्यों की अनदेखी या उनके बिना दिया गया निष्कर्ष कानून की स्पष्ट भूल और 'विकृति' (perversity) है, जिसे ठीक करना उच्च न्यायालय का अधिकार और कर्तव्य है।
उपयोग किए गए कानून और लैंडमार्क जजमेंट्स:
दिल्ली सहकारी समिति अधिनियम, 1972 (धारा 61 और 76)
'जनरल मैनेजर, इलेक्ट्रिकल रेंगाली हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट बनाम श्री गिरिधारी साहू (2019)' - रिट क्षेत्राधिकार (Certiorari) की सीमाओं और पर्यवेक्षी प्रकृति पर।
'हरि विष्णु कामथ बनाम सैयद अहमद इसहाक (1954)' - रिकॉर्ड के पटल पर स्पष्ट कानूनी भूल (error apparent on the face of record) के सुधार पर।
'सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंसेज बनाम बिकर्तन दास (2023)' - साक्ष्य-रहित या कयासों पर आधारित निष्कर्ष को कानून की भूल मानने पर।
न्यायालय की विशिष्ट टिप्पणी और न्यायसंगत विचार:
कोर्ट ने टिप्पणी की कि साक्ष्यों की गंभीर उपेक्षा कर दिए गए समवर्ती आदेशों को उच्च न्यायालय मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकता। साथ ही, कोर्ट ने समता (equity) के सिद्धांत का उपयोग करते हुए माना कि मूल दावेदार से वरिष्ठ चार अन्य सदस्य पहले से प्लॉट आवंटन की कतार में थे, अतः शर्मा को प्राथमिकता देना न्यायसंगत नहीं होता।

