शरद पूर्णिमा 2026: कुंकुमार्चन और लक्ष्मी प्राप्ति के दिव्य उपाय, माँ त्रिपुर सुंदरी की अमृतमयी उपासना

Updesh Awasthee
धर्म एवं ज्योतिष न्यूज़, 24 अक्टूबर 2026:
शरद पूर्णिमा की रात्रि केवल एक साधारण पूर्णिमा नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की समस्त ऊर्जाओं, औषधीय गुणों और दिव्य कृपा का महासंगम है। इस पावन रात्रि को 'कोजागरी पूर्णिमा' या 'रास पूर्णिमा' भी कहा जाता है। धार्मिक और तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, इस रात चंद्रमा अपनी संपूर्ण सोलह कलाओं से परिपूर्ण होकर आकाश से अमृत वर्षा करता है। इस विशेष रात्रि में आदिशक्ति पराशक्ति माँ त्रिपुर सुंदरी (माँ ललिताम्बा) और जगत जननी माँ लक्ष्मी की उपासना करने से साधक को भौतिक सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। यहां हम आपको कुंकुमार्चन और लक्ष्मी प्राप्ति के दिव्य उपाय, माँ त्रिपुर सुंदरी की अमृतमयी उपासना के बारे में शास्त्रसम्मत विधि बता रहे हैं:

माँ त्रिपुर सुंदरी का दिव्य स्वरूप और ध्यान

माँ त्रिपुर सुंदरी ब्रह्मांड की सर्वोच्च अधिष्ठात्री और श्रीविद्या की अधिगम्य देवी हैं। उनका ध्यान करते हुए साधक उनके अलौकिक स्वरूप का स्मरण करता है:
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुर-त्तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतींसौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम्॥

Simple Phonetic English
Sindooraruna-Vigraham Trinayanam Manikya-Mauli-Sphurat-Taranayaka-Sekharam Smita-Mukhim Aapina-Vakshoruham।

Panibhyam-Ali-Purna-Ratna-Chashakam Raktotpalam BibhratimSaumyam Ratna-Ghata-Stha-Rakta-Charanam Dhyayet Param Ambikam॥

IAST with Diacritics
Sindūrāruṇa-vigrahāṁ trinayanāṁ māṇikya-mauli-sphurat-tārānāyaka-śekharāṁ smita-mukhīm-āpīna-vakṣoruhām। 

Pāṇibhyām-ali-pūrṇa-ratna-caṣakaṁ raktotpalaṁ bibhratīṁsaumyāṁ ratna-ghaṭastha-rakta-caraṇāṁ dhyāyet-parām-ambikām॥

भावार्थ: जिन देवी का शरीर सिंदूर के समान लाल है, जिनके तीन नेत्र हैं, मस्तक पर माणिक्य जड़ित मुकुट और चंद्रमा सुशोभित हैं, जो मंद मुस्कान वाली हैं और जिनके हाथों में रत्नजड़ित पात्र तथा लाल कमल है, ऐसी परम करुणामयी सौम्य अंबा का हम ध्यान करते हैं। 

भंडासुर वध की पौराणिक कथा: ज्ञान और चेतना का प्राकट्य

माँ त्रिपुर सुंदरी और दुष्ट दैत्य भंडासुर के युद्ध की यह परम पावन कथा अठारह महापुराणों में से एक 'ब्रह्मांड पुराण' के उत्तर भाग में वर्णित 'ललितोपाख्यान' (ललिता माहात्म्य) से ली गई है, जिसे भगवान हयग्रीव ने ऋषि अगस्त्य को सुनाया था।

जब शिवजी ने कामदेव को अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से भस्म कर दिया, तब शिवजी के गण 'चित्रकर्मा' ने खेल-खेल में उस भस्म से एक पुतला बनाया। शिवजी की दृष्टि पड़ते ही वह एक तेजस्वी बालक बन गया। शतरुद्रीय मंत्र से तपस्या कर उसने वरदान पाया कि जिससे भी वह लड़ने जाएगा, उसका आधा बल उस बालक में समा जाएगा। ब्रह्माजी के मुख से "भंड! भंड!" (धिक्कार है) निकलने के कारण उसका नाम भंडासुर पड़ा। 

वरदान पाकर भंडासुर ने 'शून्यकपुर' को राजधानी बनाया और तीनों लोकों पर अधिकार कर देवताओं को प्रताड़ित करने लगा। तब देवर्षि नारद के परामर्श पर देवताओं ने 'महाभैरव याग' (यज्ञ) किया, जिसकी चिदग्नि (ज्ञान और चेतना की अग्नि) से साक्षात् महात्रिपुर सुंदरी (माँ ललिताम्बा) प्रकट हुईं। 

देवी ललिता और भंडासुर के बीच भयंकर महायुद्ध हुआ। देवी की शक्ति सेना ने असुरों का संहार किया और अंत में देवी ने अपने दिव्य 'कामेश्वरास्त्र' से भंडासुर और उसकी नगरी को पूरी तरह भस्म कर ब्रह्मांड में पुनः धर्म और शांति की स्थापना की। 

माँ त्रिपुर सुंदरी के लिए विशेष भोग: अमृतमयी खीर बनाने की शास्त्रोक्त विधि

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों से मिलने वाले औषधीय गुणों का लाभ उठाने के लिए विशेष खीर का भोग लगाया जाता है:
खीर केवल गाय के शुद्ध दूध, चावल, मिश्री और मखाने से बनाएं।
पूजा के बाद खीर को चांदी, मिट्टी या कांस्य के पात्र में रखकर सफेद सूती कपड़े या जाली से ढंक दें। इसे रात भर (कम से कम 3-4 घंटे) खुले आसमान के नीचे रखें जहाँ चंद्रमा की सीधी रोशनी पड़े।
ब्रह्म मुहूर्त में (सूर्योदय से पहले) इस अमृतमयी खीर को उठाकर सबसे पहले परिवार के सदस्यों को प्रसाद रूप में बांटें। इससे उत्तम स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
कृपया ध्यान रखिए यहां खीर की मात्रा नहीं बल्कि सामग्री महत्वपूर्ण है। यदि आप आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है तो न्यूनतम मात्रा में खीर बनाएं परंतु मिश्री के स्थान पर चीनी का प्रयोग ना करें।

कुंकुमार्चन: साधना का सबसे दिव्य अनुष्ठान

कुंकुमार्चन (कुमकुम + अर्चन) माँ त्रिपुर सुंदरी की आराधना का सबसे जागृत विधान है।
• मुद्रा (मृगी मुद्रा): कुमकुम चढ़ाने के लिए दाहिने हाथ के अंगूठे, मध्यमा (Middle finger) और अनामिका (Ring finger) का प्रयोग करें। तर्जनी और कनिष्ठिका का स्पर्श न हो।
• अर्चन क्रम: श्रीयंत्र या माता की मूर्ति पर चुटकी भर कुमकुम लेकर चरणों (या बाहरी हिस्से) से शुरू करते हुए केंद्र बिंदु की ओर अर्पित करें।
• मंत्र जप: प्रत्येक नाम या मंत्र के अंत में 'नमः' बोलते हुए कुमकुम चढ़ाएं। (उदा: ॐ श्रीमात्रे नमः या ॐ त्रिपुर सुंदर्यै नमः)। आप ललिता सहस्रनाम या ललिता त्रिशती का पाठ भी कर सकते हैं।
• कुमकुम का उपयोग: पूजा के बाद इस पवित्र कुमकुम को इकट्ठा कर डिब्बी में भर लें। इसे रोज़ माथे या कंठ पर तिलक के रूप में लगाने से तेज, आकर्षण और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

शरद पूर्णिमा पर दीपदान की महिमा

इस रात्रि दीपदान करने से जीवन का अंधकार दूर होता है:
1. अखंड दीप: माँ त्रिपुर सुंदरी और श्रीयंत्र के समक्ष गाय के घी का बड़ा दीपक पूरी रात प्रज्वलित रखें।
2. चतुर्मुखी दीपक: घर की मुख्य द्वार (दहलीज) पर चार मुख वाला दीपक जलाएं, जो नकारात्मक शक्तियों को रोकता है।
3. आकाश दीपदान: छत या आंगन में ऊंचे स्थान पर चंद्रमा की ओर मुख करके दीपक रखें, जिससे पितृ दोष शांत होता है और वंश वृद्धि होती है। 

शरद पूर्णिमा पर लक्ष्मी प्राप्ति के विशेष उपाय

माँ लक्ष्मी और त्रिपुर सुंदरी दोनों ही श्री विद्या और समृद्धि की देवियाँ हैं। इस रात्रि निम्नलिखित उपाय करने से आर्थिक संकट दूर होते हैं:
• कनकधारा स्त्रोत का पाठ: शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी के समक्ष घी का दीपक जलाकर 'कनकधारा स्त्रोत' या 'श्री सूक्त' का पाठ करें। इससे अटके हुए धन की प्राप्ति होती है।
• श्रीयंत्र की स्थापना और पूजन: इस रात श्रीयंत्र को घर के ईशान कोण में स्थापित कर उसकी विधिवत पूजा और कुंकुमार्चन करने से स्थायी लक्ष्मी का वास होता है।
• 11 कौड़ियों का उपाय: माता लक्ष्मी को पीली 11 कौड़ियाँ अर्पित करें और उन पर हल्दी या कुमकुम लगाएं। अगली सुबह उन्हें लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी में रखने से धन में बरकत होती है। 
• खीर का अर्पण और रात्रि जागरण: चंद्रमा की रोशनी में रखी गई खीर का कुछ भाग माँ लक्ष्मी को अर्पित करें और रात्रि में माता के भजनों या मंत्रों का जाप करते हुए जागरण करें।
शरद पूर्णिमा की यह महान रात्रि आपके जीवन में सुख, शांति, ऐश्वर्य और माँ त्रिपुर सुंदरी की असीम कृपा लेकर आए! संकलन एवं प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।

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