शिक्षक संघर्ष समिति मध्यप्रदेश और अध्यापक संयुक्त मोर्चा के आंदोलनों के परिणाम स्वरूप नवीन शिक्षक संवर्ग को प्रथम नियुक्ति दिनांक से सेवा अवधि की गणना और सेवा आधारित लाभ देने को मध्यप्रदेश सरकार तैयार प्रतीत हो रही है। इस सहमति के पीछे उच्च न्यायालय जबलपुर, इंदौर, ग्वालियर के आदेशों की भी मुख्य भूमिका है जिसमें नवीन शिक्षक संवर्ग में शामिल शिक्षाकर्मियों को प्रथम नियुक्ति से शासकीय कर्मचारी मानते हुए 2006 से छठवां वेतनमान और 2016 से सातवां वेतनमान की अंतर राशि 12 प्रतिशत ब्याज के साथ भुगतान करने कहां है। स्वाभाविक है 1 जनवरी 2006 के पहले इस संवर्ग को पांचवां वेतनमान की अंतर राशि भी मय ब्याज के देनी होगी।
सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में कहां है कि कोई भी कर्मचारी संविदा, तदर्थ आदि के रुप में कार्य करते हुए यदि शासकीय सेवक बनता है तो सेवाकालीन और सेवानिवृत्ति समस्त लाभों के लिए उसकी पूर्व में की गई संविदा, तदर्थ आदि सेवा को जोड़ा जाए और सेवाकालीन और सेवानिवृत्ति लाभ में गणना की जाए। अभी हाल फिलहाल में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड बनाम सतपाल सिंह और मध्यप्रदेश पंचायत विभाग बनाम पंचायत सचिव मामले में इसकी पुष्टि हुई।
नवीन शिक्षक संवर्ग में शामिल शिक्षाकर्मी, संविदा शाला शिक्षक, गुरुजी संवर्ग के नाम से अलग-अलग समय में नियुक्त हुआ तथा बाद में संयुक्त रुप से यह अध्यापक संवर्ग कहलाया। अध्यापक संवर्ग को 15 जुलाई 2018 में मध्यप्रदेश स्कूल राज्य शिक्षा सेवा में नियुक्त करते ही शासकीय सेवक का दर्जा उसके द्वारा पूर्व में गई सेवा के आधार पर मिला। मध्यप्रदेश सरकार की प्रथम नियुक्ति दिनांक से सेवा अवधि का लाभ न्यायालयों के आदेशानुसार और शिक्षकों के संघर्षों को देखते हुए देने की मंशा जाहिर हो रही है।
मध्यप्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम 1976 के अनुसार पेंशन और पारिवारिक पेंशन मध्यप्रदेश में 1 जनवरी 2005 से बंद की गई है। चूंकि शिक्षाकर्मी संवर्ग, गुरुजी संवर्ग और जिनकी नियुक्ति 2001 और 2003 में संविदा शाला शिक्षक संवर्ग के रुप में हुई है यह प्रथम नियुक्ति दिनांक से सेवा अवधि की गणना के आधार पर मध्यप्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम 1976 के दायरे में आयेगा। लगभग इन शिक्षकों की संख्या एक लाख के करीब होगी। नेशनल पेंशन स्कीम में मध्यप्रदेश सरकार को इनके नेशनल पेंशन स्कीम खाते में चौदह प्रतिशत अंशदान जमा करना पड़ता है। यदि प्रति शिक्षक यह राशि औसतन दस हजार भी हुई तो एक लाख शिक्षकों पर सौ करोड़ रुपए राशि मध्यप्रदेश सरकार को नेशनल पेंशन स्कीम में प्रतिमाह जमा करनी पड़ती है। बारह माह में यह राशि बारह सौ करोड़ हो जाती है। मध्यप्रदेश सरकार नवीन शिक्षक संवर्ग को प्रथम नियुक्ति दिनांक से सेवा अवधि का लाभ देती है तो पांचवां, छठवां, सातवां वेतनमान की अवशेष राशि देने में सरकारी आंकड़ों के अनुसार छ: सौ पचास करोड़ का अनुमानित व्यय होगा और 1 जनवरी 2005 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों को प्रथम नियुक्ति दिनांक से सेवा अवधि का लाभ देते हुए पुरानी पेंशन बहाल की जाती है तो नेशनल पेंशन स्कीम में चौदह प्रतिशत अंशदान जमा नहीं करने के कारण बारह सौ करोड़ की राशि न्यूनतम प्रतिवर्ष जमा नहीं करनी होगी जिससे पहले वर्ष ही पांच सौ पचास करोड़ की बचत मध्यप्रदेश सरकार को होगी और दूसरे वर्ष से न्यूनतम बारह सौ करोड़ की बचत नेशनल पेंशन स्कीम में राशि जमा नहीं करने के कारण होगी।
नेशनल पेंशन स्कीम में जमा कर्मचारी का प्रतिमाह 10 प्रतिशत अंश और मध्यप्रदेश सरकार का प्रतिमाह 14 प्रतिशत अंश हर तीन माह में पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) में जमा करना होता है जिस राशि को खर्च करने का अधिकार न राज्य सरकारों को है न केन्द्र सरकार को है। लेकिन नवीन शैक्षणिक संवर्ग को मध्यप्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम 1976 के दायरे में लाने पर सामान्य भविष्य निधि (जीपीएफ) खाता खोलना अनिवार्य होगा। जिस में जमा राशि को मध्यप्रदेश सरकार अपनी विकास योजनाओं में खर्च कर सकती है जिससे मध्यप्रदेश के विकास कार्यों में तेजी आयेगी।
1 जनवरी 2005 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों को मध्यप्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम 1976 के दायरे में लाने से एकमुश्त आर्थिक भार मध्यप्रदेश सरकार पर नहीं आयेगा। क्योंकि शिक्षाकर्मी संवर्ग, गुरुजी संवर्ग, संविदा शाला शिक्षक संवर्ग की सेवानिवृत्ति का क्रम 2040 के बाद तक चलते रहेगा। जितना व्यय मध्यप्रदेश सरकार को इनको पेंशन या इनके परिवार को पारिवारिक पेंशन देने में करना होगा उससे कहीं अधिक बचत नेशनल पेंशन स्कीम में अंशदान जमा नहीं करने से होगी। शिक्षक आशान्वित हैं कि मध्यप्रदेश सरकार माननीय उच्च न्यायालयों के आदेश के परिपालन में एवं नवीन शिक्षक संवर्ग की मांग को देखते हुए सकारात्मक कदम उठाकर सेवानिवृत्ति उपरांत सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगी। विचारक एवं लेखक: रमेश पाटिल, वरिष्ठ अध्यापक।

