ग्वालियर | 15 अक्टूबर 2026: अनुकंपा नियुक्ति के मामले में यदि नियुक्ति करने वाले विभाग के अधिकारियों से कोई नीतिगत गलती हो जाती है, तो इसके कारण नियुक्त किए गए कर्मचारी की सेवा समाप्त नहीं की जा सकती। ऐसी स्थिति में पॉलिसी को नजर अंदाज करने वाला अधिकारी, गलत व्यक्ति की नियुक्ति करने के लिए जिम्मेदार होगा लेकिन यदि अनुकंपा के तहत नियुक्त हुआ कर्मचारी, संबंधित पद की योग्यता रखता है तो उसकी सेवा समाप्त नहीं होगी। यह फैसला हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश की ग्वालियर बेंच द्वारा दिया गया है।
मामले की पूरी पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता सूरज सागर अनुसूचित जाति वर्ग से आते हैं और दवासाज पद हेतु आवश्यक योग्यता रखते हैं। उनकी दादी (स्व. श्रीमती कृष्णा देवी) शासकीय आयुर्वेद औषधालय, मेहगांव (जिला भिंड) में 'दाई' के पद पर कार्यरत थीं। वर्ष 2008 में याचिकाकर्ता के पिता स्व. वीर सिंह का निधन हो गया था, उस समय याचिकाकर्ता की उम्र महज 12 वर्ष थी। पिता की मृत्यु के पश्चात याचिकाकर्ता, उनकी विधवा मां, दो बहनें और छोटा भाई पूरी तरह अपनी दादी पर ही आश्रित हो गए। इसी आश्रितता के कारण दादी ने अपने सर्विस रिकॉर्ड में याचिकाकर्ता को नामांकित (nominate) भी किया था।
अनुकंपा नियुक्ति और विभागीय कार्रवाई
6 दिसंबर 2015 को दादी के निधन के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी अशिक्षित विधवा मां की सहमति से 9 जून 2016 को अनुकंपा नियुक्ति हेतु आवेदन दिया। स्क्रीनिंग कमेटी ने राज्य शासन की अनुकंपा नीति (दिनांक 29.09.2014) के तहत विचार कर सिफारिश की, जिसके आधार पर 29 अगस्त 2016 को याचिकाकर्ता को दवासाज के पद पर नियुक्त किया गया। उन्होंने 30 अगस्त 2016 को शासकीय आयुर्वेदिक औषधालय, देहभई (जिला दतिया) में कार्यभार संभाला और अपनी परिवीक्षा अवधि पूरी की। वर्ष 2018 में एक शिकायत के आधार पर विभाग ने कारण बताओ नोटिस जारी किया। विभाग का कहना था कि 2014 की नीति के तहत पोता (grandson) पात्र आश्रितों की श्रेणी में नहीं आता। याचिकाकर्ता के स्पष्टीकरण के बावजूद संभागीय आयुष अधिकारी ने 18 फरवरी 2019 को उनकी नियुक्ति रद्द कर दी। याचिकाकर्ता ने इस निरस्तीकरण आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जहाँ 8 मार्च 2019 को अदालत ने आदेश के क्रियान्वयन पर स्थगन (stay) दे दिया था।
अदालत में पक्षों की दलीलें
राज्य के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अनुकंपा नीति की कंडिका 2.1 से 2.7 में पोता पात्र श्रेणी में शामिल नहीं है, इसलिए निरस्तीकरण वैध है। वहीं, मृतक कर्मचारी की बेटी (हस्तक्षेपकर्ता) ने भी याचिका का विरोध करते हुए कहा कि परिवार में उत्तराधिकार का मामला अदालत में लंबित है और याचिकाकर्ता अनुकंपा का हकदार नहीं था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राज बहादुर सिंह तोमर ने तर्क दिया कि नियुक्ति के समय कोई तथ्य नहीं छिपाया गया था और स्क्रीनिंग कमेटी ने सभी परिस्थितियों की जांच के बाद ही पारदर्शी तरीके से नियुक्ति दी थी।
उच्च न्यायालय का निष्कर्ष एवं कानूनी आधार
उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता ने नियुक्ति प्राप्त करने में कोई धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज या तथ्य छिपाने का कार्य नहीं किया था। Screening Committee के समक्ष परिवार के सभी तथ्य मौजूद थे। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों 'मोहम्मद ज़मील अहमद बनाम बिहार राज्य (2016)' तथा 'यूनीयन ऑफ इंडिया बनाम के.पी. तिवारी (2003)' का हवाला दिया। कोर्ट ने माना कि यदि कर्मचारी ने कोई कपट न किया हो और वह वर्षों से सेवा दे रहा हो, तो उसे इस स्तर पर आजीविका से वंचित करना अनुचित है।
अदालत ने ध्यान रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2016 से (लगभग 10 वर्ष) और कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत 7 वर्ष से अधिक समय से निरंतर निष्ठापूर्वक सेवा दे रहे हैं। उच्च न्यायालय ने 18 फरवरी 2019 के निरस्तीकरण आदेश को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि 29 अगस्त 2016 से निरंतर सेवा में माना जाएगा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अंतरिम आदेश की अवधि को निरंतर सेवा मानते हुए याचिकाकर्ता को सभी सेवा लाभ एवं बकाया मौद्रिक लाभ (monetary benefits) जारी किए जाएं।

