भोपाल समाचार, 9 अक्टूबर 2026: सामान्य तौर पर दो प्रकार की बातें होती है। एक बात कानून और संविधान के दायरे में होती है और दूसरी ऐसी होती है जिसमें जनता खुद जज करती है। वह अपनी सुविधा और लाभ के हिसाब से जजमेंट देती है। ओबीसी आरक्षण के मामले में कुछ ऐसा ही हो रहा है, लेकिन यदि आप जानना चाहते हैं कि मध्य प्रदेश में ओबीसी को 27% आरक्षण क्यों नहीं मिला। इसका लॉजिक क्या है, कानूनी आधार क्या है, तो फिर ध्यान से पढ़िए:-
सबसे पहले कंफ्यूजन दूर कीजिए, EWS आरक्षण की तुलना OBC आरक्षण से नहीं कर सकते
मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण का विवाद 2019 से चल रहा है। मुख्य समस्या यह है कि ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% करने पर राज्य का कुल आरक्षण 50% की संवैधानिक सीमा से काफी ऊपर चला जाता है। EWS आरक्षण होरिजेंटल है, बिल्कुल वैसे ही जैसे महिला आरक्षण। मतलब यह दलील नहीं दी जा सकती की 10% ओबीसी आरक्षण के कारण जाति आधारित आरक्षण की 50% सीमा का उल्लंघन हो चुका है। 2019 में कमलनाथ सरकार ने ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया। इससे SC+ST+OBC = 63% हो जाता है। यही मुख्य कानूनी अड़चन है।
जिसकी जितनी आबादी है उसको उतना आरक्षण नहीं दे सकते
कमलनाथ सरकार ने 27% ओबीसी आरक्षण का आधार ही गलत बना दिया था। उन्होंने कहा कि जिसकी जितनी आबादी उसको उतना आरक्षण। लेकिन संविधान में ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं है। सबसे बड़ा आधार इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) का फैसला है। नौ जजों की बेंच (संवैधानिक पीठ) ने कहा था कि आरक्षण सामान्यतः 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए, सिवाय “असाधारण परिस्थितियों” के। 2021 में मराठा आरक्षण मामले (जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल) में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से 50% सीमा दोहराई और महाराष्ट्र के 16% मराठा आरक्षण को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि: मात्र आबादी ज्यादा होना काफी नहीं है। सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ापन और सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का ठोस, समकालीन डेटा चाहिए। “असाधारण परिस्थिति” साबित करनी पड़ती है।
गलती कांग्रेस और कमलनाथ सरकार ने की
संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत राज्य सरकार (कैबिनेट, जिसका नेतृत्व मुख्यमंत्री करते हैं) पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण तय कर सकती है, लेकिन 50% से ऊपर जाने के लिए इंद्रा साहनी (1992) में जो “असाधारण परिस्थिति” कही गई है, उसका निर्धारण सिर्फ मुख्यमंत्री या सरकार के कहने से नहीं हो जाता। यहीं पर गलती हो गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने “असाधारण परिस्थिति” का निर्धारण किए बिना ही, जल्दबाजी में, पॉलिटिकल फायदे के लिए, 27% ओबीसी आरक्षण लागू कर दिया। शायद उन्होंने सोचा होगा कि जब कोई पॉलिटिकल पार्टी को आपत्ति नहीं है तो फिर कोई प्रॉब्लम ही नहीं होगी। राहुल गांधी ने भी अपने पत्र में ऐसा ही लिखा है, लेकिन वह समझ नहीं पाए कि, एक आम आदमी भी इस प्रावधान को कोर्ट में चुनौती दे सकता है। जैसे ही कमलनाथ ने आधा अधूरा प्रावधान लागू किया, कोर्ट में उसको चैलेंज कर दिया गया।
कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को क्या करना चाहिए था
सरकार (मुख्यमंत्री की अगुवाई में) डेटा इकट्ठा करती, आयोग बैठाती।
अध्यादेश जारी करती या विधानसभा से कानून पास करवाती।
इसके बाद “असाधारण परिस्थिति” को प्रमाणित करने के लिए, कानूनी को न्यायालय के सामने अंतिम निर्णय हेतु प्रस्तुत करती।
न्यायालय द्वारा “असाधारण परिस्थिति” मान लिए जाने के बाद कानून लागू करती तो फिर कोई उसको चैलेंज नहीं कर पाता।
कांग्रेस चाहती ही नहीं 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण
मध्य प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री होने के नाते मोहन यादव अपनी तरफ से हर संभव कोशिश कर रहे हैं लेकिन भारत में किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री संविधान नहीं बदल सकता, सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित किया गया न्याय का सिद्धांत नहीं बदल सकता, लेकिन फिर भी उन्होंने कोशिश की। सभी पक्षों को बुलाकर रणनीति समझाई कि किस प्रकार 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को लागू करवाया जा सकता है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को बुलाया, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को बुलाया। सबको उनकी भूमिका समझाई लेकिन कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों एवं जनता के सामने ओबीसी आरक्षण की मांग करते हुए दिखाई देने वाले विद्वानों ने मोहन की रणनीति पर काम ही नहीं किया।
उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उनको लगता था कि यदि मध्य प्रदेश में 27% ओबीसी आरक्षण लागू हो गया तो इसका श्रेय डॉ मोहन यादव को मिल जाएगा। विपक्ष के लोगों को युवाओं के भविष्य की चिंता नहीं है, अपनी पॉलिटिक्स की चिंता है। इसीलिए 27% ओबीसी आरक्षण का हल नहीं निकाला जाता है, बल्कि इस आग को समय-समय पर भड़काया जाता है। जैसे हाल ही में 23 सितंबर को राहुल गांधी ने एक चिट्ठी लिखकर आग में घी डाल दिया था। बड़ी चतुराई के साथ, यह नहीं लिखा कि आप जो भी निर्णय लेंगे, कांग्रेस पार्टी आपके साथ है। जीतू पटवारी और उमंग सिंघार बात का बतंगड़ नहीं बनाएंगे।
अब प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी कह रहे हैं कि हम सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। कांग्रेस के जो वकील हाईकोर्ट में केस जीते नहीं पाए, क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह सुप्रीम कोर्ट में जीत जाएंगे?

