भोपाल समाचार, 11 अक्टूबर 2026: मध्य प्रदेश के अतिथि शिक्षक वर्ग के लिए once in a lifetime opportunity आई है। यदि मध्य प्रदेश के समस्त अतिथि शिक्षक संगठित होकर और बिल्कुल ठीक रणनीति के तहत आगे बढ़ते हैं तो, उनका नियमितीकरण हो सकता है, जैसे शिक्षा कर्मियों को "अध्यापक" श्रेणी मिल गई, वैसा कुछ अतिथि शिक्षकों को भी मिल सकता है।
बात ऐसी है कि, श्री बुद्धेश कुमार वैद्य, सचिव, माध्यमिक शिक्षा मण्डल मध्यप्रदेश भोपाल ने 9 अक्टूबर 2026 को मध्य प्रदेश के समस्त जिला कलेक्टरों के नाम एक पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि किस प्रकार से चुनाव के लिए जनगणना और एमपी बोर्ड द्वारा आयोजित हाई स्कूल एवं हाई सेकेंडरी स्कूल परीक्षा का आयोजन एक साथ किया जा सकता है एवं दोनों महत्वपूर्ण कामों को एक साथ पूरा करने के लिए ह्यूमन रिसोर्स का किस प्रकार से उपयोग करेंगे। इसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा है की पहली बार अतिथि शिक्षकों को बोर्ड परीक्षा के पर्यवेक्षक के काम में लगाया जाएगा। इस लाइन के कई अर्थ निकलते हैं:-
आज से पहले तक अतिथि शिक्षक केवल स्कूल शिक्षा विभाग अथवा ट्राइबल डिपार्टमेंट के अतिथि हुआ करते थे। पहली बार मध्य प्रदेश शासन ने अतिथि शिक्षकों को अपना कर्मचारी मान लिया है, क्योंकि बोर्ड परीक्षा जैसे महत्वपूर्ण काम में अनुबंध कर्मचारी, प्राइवेट एजेंसी अथवा अतिथियों का उपयोग किया ही नहीं जा सकता है।
यहां नोट करना जरूरी है कि माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्य प्रदेश का गठन "THE MADHYA PRADESH MADHYAMIK SHIKSHA ADHINIYAM,1965" के तहत हुआ है और यह मध्य प्रदेश शासन के अंतर्गत लेकिन स्कूल शिक्षा विभाग से स्वतंत्र संस्थान (स्वायत्त निकाय) है। परीक्षा मंडल की स्थापना मध्य प्रदेश सरकार की अधिसूचना के द्वारा हुई है, स्कूल शिक्षा विभाग के सर्कुलर के अनुसार नहीं।
भारत का चुनाव आयोग की जनगणना के काम में अतिथि शिक्षकों का उपयोग नहीं करता क्योंकि अब तक अतिथि शिक्षकों को शासन का कर्मचारी नहीं माना जाता था लेकिन अब जबकि माध्यमिक शिक्षा मंडल मध्य प्रदेश द्वारा अतिथि शिक्षकों को पर्यवेक्षक नियुक्त किया जा रहा है तो इसका सीधा अर्थ है कि सरकार ने मन बना लिया है कि यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो अतिथि शिक्षकों को कम से कम एक नौकरी की सुरक्षा तो दे ही दी जाएगी। उनको अचानक कभी भी हटाया नहीं जा सकेगा और उनके स्थान पर अचानक किसी की नियुक्ति नहीं की जा सकेगी।
इस बात की संभावना भी है कि शासन के रणनीतिकार, उपलब्ध 70000 अतिथि शिक्षकों को, पात्रता परीक्षा का विरोध कर रहे 70000 शिक्षकों के विकल्प के रूप में विचार कर रहे हों, क्योंकि यह मामला ऐसा ही है। आंदोलन कर रहे शिक्षकों को लगता है कि जिस प्रकार से आंदोलन करके, शिक्षाकर्मी से अध्यापक बन गए थे, वैसे ही आंदोलन करके पात्रता परीक्षा से भी बच जाएंगे, लेकिन जिन लोगों ने संविधान पढ़ा है उनको मालूम है कि, शिक्षा का अधिकार अधिनियम में संशोधन किए बिना पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता को समाप्त किया ही नहीं जा सकता। यदि विरोध करना था तो तब करना चाहिए था जब शिक्षा का अधिकार अधिनियम प्रस्तावित किया गया था, और सरकार द्वारा नियम के अनुसार इस पर दावे और आपत्ति मांगे गए थे।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, भारत का एकमात्र ऐसा अधिनियम है जिसके कारण संविधान में संशोधन हुआ। इसलिए शिक्षा का अधिकार अधिनियम में संशोधन करना, किसी भी राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र के बाहर है और केंद्र सरकार भी ऐसा तभी कर सकती है जब उसके पास पूरे संविधान को संशोधित करने की शक्ति हो। मतलब 400 पार, जो तो वर्तमान सरकार के पास है और ना ही 2029 के बाद किसी के पास होने की संभावना है।
शिक्षक समझ नहीं पा रहे हैं कि आंदोलन करके आदेश वापस करवाए जा सकते हैं, नियम बलवाए जा सकते हैं, कानून को शिथिल किया जा सकता है लेकिन संविधान में संशोधन नहीं करवाया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट का गठन संविधान की सुरक्षा के लिए हुआ है और सुप्रीम कोर्ट ऐसा ही कर रहा है। किसी दिग्विजय सिंह के बयान दे देने से, मामला कमजोर नहीं होता। हां इतना जरूर हो सकता है कि लगातार आंदोलन चलने के बाद एक समय ऐसा है जब सुप्रीम कोर्ट आंदोलन करने वाले सभी शासकीय सेवकों की सेवा समाप्ति के आदेश दे दे। ऐसी स्थिति में स्कूल शिक्षा विभाग को तत्काल नियमित शिक्षकों के रिप्लेसमेंट की जरूरत होगी। शासन के पास अतिथि शिक्षक के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
कुल मिलाकर अतिथि शिक्षकों के हाथ में एक ऐसा अवसर आ गया है, जो उनकी जिंदगी में पहली बार आया है और शायद आखरी बार भी है। यदि उचित रणनीति के साथ, संगठन, अनुशासन, मर्यादा, सभ्यता, विनम्रता और कानूनी समझ के साथ रणनीति पूर्व काम करेंगे तो, अतिथि शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।


