झाबुआ कलेक्टर, किसान की जमीन को मंदिर के नाम पर हड़पना चाहते थे, हाई कोर्ट से मिला न्याय

Updesh Awasthee
इंदौर, 4 अक्टूबर 2026:
हाई कोर्ट में झाबुआ के एक किसान परिवार को ऐसा नहीं मिला है जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता। सारी कायनात (नायब तहसीलदार से लेकर अपर आयुक्त तक) किसान की जमीन को मंदिर के नाम पर हड़पना चाहते थे। न्यायमूर्ति संदीप एन. भट्ट की एकल पीठ द्वारा कलेक्टर की याचिका को खारिज कर दिया गया। इस प्रकार एक बार फिर स्थापित हुआ कि, भारत में संविधान का शासन है, कलेक्टर माईबाप नहीं होता। 

मामला क्या है
मामला झाबुआ जिले के ग्राम सारंगी (पटवारी हल्का नंबर 16) स्थित खाता नंबर 602 (सर्वे नंबर 878, 879, 1134 आदि, कुल रकबा 6.78 हेक्टेयर) भूमि से संबंधित है। याचिका में राज्य सरकार (कलेक्टर झाबुआ व्यवस्थापक के रूप में) का कहना था कि यह भूमि प्राचीन काल से श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर की स्वामित्व वाली 'भूमिस्वामी' संपत्ति रही है और कलेक्टर इसके व्यवस्थापक हैं। सरकार का तर्क था कि प्रतिवादियों (भेरा, मांगीलाल आदि, पुत्र चुन्नीलाल) का नाम राजस्व रिकॉर्ड में केवल 'अधिपति कृषक' (काश्तकार) के रूप में दर्ज किया गया था, जिसे बाद में निरस्त कर दिया गया था। 

हाई कोर्ट में किसानों का पक्ष: 
प्रतिवादियों के वरिष्ठ अधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि वर्ष 1920 के मूल राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार गांव में दो अलग-अलग खाते मौजूद थे। खाता नंबर 105/1 (मंदिर माफी देवस्थान) और खाता नंबर 105/2 (चुन्नीलाल)। यह भूमि मंदिर को कभी दान नहीं दी गई थी, बल्कि चुन्नीलाल और उनके वारिस लगातार स्वतंत्र रूप से इस पर काबिज और खेती करते आए हैं। 

सबसे पहले नायब तहसीलदार हारे
सबसे पहले नायब तहसीलदार ने धारा 115 के तहत स्वतः संज्ञान लेते हुए प्रतिवादियों के नाम निरस्त कर भूमि मंदिर के नाम दर्ज करने का आदेश जारी किया था।
अनुविभागीय अधिकारी (SDO) पेटलावद ने 9 जनवरी 2004 को अपील स्वीकार करते हुए नायब तहसीलदार के आदेश को रद्द कर दिया और राजस्व अभिलेखों में प्रतिवादियों का नाम बहाल रखने का निर्देश दिया। राज्य सरकार द्वारा इस आदेश को चुनौती न दिए जाने के कारण यह अंतिम रूप ले चुका था।

फिर अपर आयुक्त इंदौर हारे
बाद में अपर आयुक्त इंदौर संभाग ने धारा 50 के तहत स्वतः संज्ञान (suo moto revision) लेते हुए 7 अप्रैल 2007 को SDO के आदेश को निरस्त कर पुनः भूमि मंदिर के नाम दर्ज करने का आदेश दे दिया। 

प्रतिवादियों ने इस आदेश को राजस्व मंडल ग्वालियर में चुनौती दी। राजस्व मंडल ने 17 मार्च 2011 को माना कि खाता नंबर 105/1 और खाता नंबर 105/2 दो अलग-अलग खाते थे और बिना किसी वैधानिक अपील/पुनरीक्षण के स्वतः संज्ञान लेकर दिया गया अपर आयुक्त का आदेश अमान्य था। 

अंत में झाबुआ कलेक्टर भी हारे
अब झाबुआ कलेक्टर की ओर से राजस्व मंडल ग्वालियर के फैसले को दी हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद माना कि राजस्व मंडल ने उपलब्ध साक्ष्यों और राजस्व रिकॉर्ड का सही मूल्यांकन किया है। न्यायालय ने पाया कि अपर आयुक्त द्वारा स्वतः संज्ञान में लिया गया निर्णय कानून के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं था और राजस्व मंडल के आदेश में कोई वैधानिक या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं है।
इन आधारों के साथ उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार (झाबुआ कलेक्टर) की रिट याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।

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