भोपाल, मध्य प्रदेश | 13 अक्टूबर 2026: मध्य प्रदेश शासन, स्कूल शिक्षा विभाग के अंतर्गत अध्यापक संवर्ग में सेवाएं दे रहे सरकारी कर्मचारी (जिनको 1997 से 1999 के बीच शिक्षाकर्मी के रूप में सेवा में शामिल किया गया था) हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश द्वारा याचिका क्रमांक डब्ल्यूपी-42009-2026 के निराकरण से बड़े आशांवित हैं। सोशल मीडिया पर यह खबर भी वायरल की जा रही है कि उपरोक्त अवधि वाले अध्यापकों को पात्रता परीक्षा से छूट देने हेतु हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश शासन को निर्देशित किया है। बात सही है कि हाईकोर्ट ने निर्देश दिया है, लेकिन इसका अर्थ वह नहीं है जो वायरल हो रहा है, सही अर्थ क्या है, मैं बताता हूं....
अनिल कुमार तोमर एवं अन्य बनाम स्कूल शिक्षा विभाग
अनिल कुमार तोमर एवं अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता जितेंद्र आर्य ने पक्ष रखते हुए हाई कोर्ट को बताया कि संबंधित शिक्षाकर्मी वर्ग-दो और वर्ग-तीन के पदों पर वर्ष 1997 से 1999 के बीच नियुक्त हुए थे। उनकी नियुक्तियां 3 सितंबर 2001 से पहले की हैं। वर्तमान में पदोन्नति की प्रक्रिया में टीईटी उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता का मुद्दा सामने आने के बाद उन्होंने शासन से इस संबंध में स्पष्ट निर्णय लेने की मांग की है। याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष में विभिन्न न्यायिक निर्णयों का हवाला भी दिया है। इनमें सर्वोच्च न्यायालय के अंजुमन इशाअत-ए-तालीम ट्रस्ट मामले और रामदास समराव सोलास्कर बनाम महाराष्ट्र राज्य प्रकरण का उल्लेख किया गया है। उनका तर्क है कि नियुक्ति की तारीख और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर उनके मामले पर विचार किया जाना चाहिए।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शासन को याचिकाकर्ताओं के लंबित अभ्यावेदन का 60 दिनों के भीतर निराकरण करने के निर्देश दिए हैं। 12 अक्टूबर 2026 को पारित आदेश में शासन के सक्षम प्राधिकारी को अभ्यावेदन पर स्पष्ट और कारण सहित निर्णय लेने के लिए कहा गया है।
हाई कोर्ट के निर्देश से क्या उम्मीद की जा सकती है
अपनी मनोकामनाओं को त्याग कर यदि याचिका को ध्यान से पढ़ेंगे तो समझ में आता है कि, हाई कोर्ट से निवेदन किया गया था कि हमारे अभ्यावेदन, स्कूल शिक्षा विभाग में लंबित है, वह जवाब नहीं दे रहे हैं। हाईकोर्ट ने शासन को निर्देशित किया है कि, 7 दिन के भीतर लंबित अभ्यावेदन का कारण सहित जवाब दीजिए।
स्थिति स्पष्ट हो गई? हाई कोर्ट में जवाब देने के लिए निर्देश दिया है? फैसला लेने के लिए निर्देश नहीं दिया है? यहां इस बात का ध्यान भी रखना पड़ेगा कि हाईकोर्ट ने कोई अंतरिम राहत नहीं दी है। अब सवाल उठता है कि हाई कोर्ट के निर्देश के पालन में शासन क्या कर सकता है।
यदि किसी भी अभ्यावेदन में कोई व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क जजमेंट का उल्लेख करता है। जैसे कि इस मामले में "सर्वोच्च न्यायालय के अंजुमन इशाअत-ए-तालीम ट्रस्ट मामले और रामदास समराव सोलास्कर बनाम महाराष्ट्र राज्य" का उल्लेख किया गया है तो शासन का कोई भी अधिकारी, इसके आधार पर फैसला नहीं ले सकता क्योंकि, लैंडमार्क जजमेंट के आधार पर फैसला लेने का अधिकार प्रशासन के अधिकारियों को नहीं है। यह फैसला हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ही ले सकता है।
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि, स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से अभ्यावेदन का जवाब नहीं दिया गया था, हाई कोर्ट में निर्देश दिया है तो, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लेख करते हुए अभ्यावेदन का कारण सहित जवाब दे दिया जाएगा। इसके कारण पात्रता परीक्षा में किसी भी प्रकार की राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, क्योंकि शासन के किसी भी अधिकारी को राहत देने का अधिकार ही नहीं है। यह मामला केवल सुप्रीम कोर्ट में ही डिसाइड हो सकता है, अन्यथा कहीं नहीं। उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।

