सनातन धर्म में अनेक ऐसी वनस्पतियाँ हैं, जिन्हें मात्र पौधे न मानकर देव-तुल्य पूजनीय स्थान दिया गया है। तुलसी, पीपल और वटवृक्ष की भांति ही 'कुश' (विशेष पवित्र घास) को भी परम पवित्र और अलौकिक शक्तियों से परिपूर्ण माना गया है। चाहे भगवान की पूजा-अर्चना हो, हवन-यज्ञ हो या फिर पितरों का श्राद्ध-तर्पण; बिना कुश के सनातन धर्म का कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हरी-सूखी दिखने वाली इस साधारण सी घास की उत्पत्ति भगवान विष्णु से जुड़ी है? और भाद्रपद अमावस्या को ही इसे उखाड़कर घर लाने की परंपरा क्यों है? आइए जानते हैं कुश की पौराणिक कथा, इसके संचयन का नियम और जीवन में इसके अद्भुत धार्मिक उपयोग।
कुश की उत्पत्ति की पौराणिक कथा:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कुश की उत्पत्ति का संबंध भगवान श्री हरि विष्णु के वराह अवतार तथा समुद्र मंथन की घटना से माना जाता है: जब भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह अवतार लिया और पृथ्वी को समुद्र से निकालकर स्थापित किया, तब जल से बाहर आने के बाद उन्होंने अपने शरीर को झटका। उस समय उनके शरीर के रोम टूटकर पृथ्वी पर गिरे, जिनसे कुश घास की उत्पत्ति हुई। इसी कारण इसे भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है।
समुद्र मंथन और अमृत कलश:
एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, जब देवों और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से अमृत कलश निकला, तो उसे ले जाते समय अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर उगी घास पर गिर गईं। अमृत के स्पर्श से वह घास अमर और परम पवित्र हो गई, जिसे कुश कहा गया।
कुशग्रहणी (कुशोत्पाटनी) अमावस्या क्या है?
भाद्रपद (भादों) माह की अमावस्या को कुशाग्रहणी अमावस्या या कुशोधपाटनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, इस विशेष तिथि पर वर्षभर के सभी धार्मिक, पितृ और पूजा कार्यों के लिए कुश उखाड़कर (एकत्र करके) घर लाने का विधान है।
अमावस्या पर कुश उखाड़ने की धार्मिक परंपरा और नियम
शास्त्रों का निर्देश है कि यदि भाद्रपद अमावस्या के दिन विधि-विधान से कुश उखाड़कर संग्रहित किया जाए, तो वह पूरे एक वर्ष तक पवित्र और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए सर्वथा योग्य रहता है।
कुश उखाड़ने के मुख्य नियम:
- कुश को केवल सूर्योदय के समय या प्रातःकाल ही उखाड़ा जाना चाहिए।
- कुश उखाड़ते समय लोभ या क्रोध का त्याग करके दाहिने हाथ से इसे उखाड़ते हुए यह मंत्र बोला जाता है:"ॐ हूँ फट्" या "विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिनिसर्गज। नुद सर्वानि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव॥"
- कुश को उखाड़ते समय किसी लोहे की दराती, चाकू या औजार का उपयोग नहीं किया जाता; इसे केवल हाथ से ही उखाड़ा जाता है।
- जो कुश रास्ते में कुचला गया हो, गंदे स्थान पर हो या जला हुआ हो, उसे धार्मिक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता।
धार्मिक अनुष्ठानों में कुश का उपयोग:
सनातन परंपरा में बिना कुश के किया गया कोई भी धार्मिक कार्य अधूरा और फलहीन माना जाता है। इसके प्रमुख धार्मिक उपयोग निम्नलिखित हैं:
कुश का आसन: पूजा, जप, ध्यान और संध्यावंदन के दौरान कुश से बने आसन पर बैठना अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, कुश का आसन शरीर की ऊर्जा को भूमि में प्रवाहित होने से रोकता है और मन को एकाग्र करता है।
कुश की पवित्री (अंगूठी): पूजा और हवन करते समय अनामिका (ring finger) अंगुली में कुश से बनी अंगूठी ('पवित्री') पहनी जाती है। यह शरीर और मन को पूजा के दौरान नकारात्मक शक्तियों से मुक्त रखती है।
पितृ कार्य एवं श्राद्ध: श्राद्ध पक्ष और तर्पण के समय कुश का प्रयोग अत्यंत आवश्यक है। हाथ में कुश धारण करके पितरों को जल अर्पित करने से उन्हें शांति और तृप्ति मिलती है।
ग्रहण काल में उपयोग: चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण के समय भोजन, पानी, दूध और पूज्य वस्तुओं में कुश डाल दिया जाता है, जिससे ग्रहण का सूतक प्रभाव और नकारात्मक किरणें उन पर असर नहीं कर पातीं।
मार्जन और शुद्धिकरण: गंगाजल में कुश डुबोकर घर, पूजन सामग्री तथा स्वयं पर जल छिड़कने (मार्जन) से वातावरण और शरीर शुद्ध हो जाता है। प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।

