हड़ताल या आंदोलन के नाम पर रास्ता जाम करना, कितना गंभीर अपराध और सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क जजमेंट पढ़िए

Updesh Awasthee
भोपाल, 9 सितंबर 2026:
सोमवार 7 सितंबर शाम 5:00 बजे से कुछ प्रदर्शनकारी युवाओं ने भोपाल शहर का ट्रैफिक ब्लॉक कर दिया है। लाखों लोगों को परेशानी हो रही है। यहां तक की स्कूल बस और एंबुलेंस को भी परेशानी हो रही है, लेकिन ना तो प्रदर्शन करने वाले रास्ता क्लियर कर रहे हैं और ना ही पुलिस उनसे रास्ता क्लियर करवा रही है। आईए जानते हैं कि इस तरह हड़ताल या आंदोलन के नाम पर रास्ता जाम कर देना। कितना गंभीर अपराध है और इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क जजमेंट क्या है। 

चक्काजाम से संबंधित कानून और धाराएं 

सड़क जाम (चक्काजाम) के मामले में आमतौर पर ये प्रावधान लागू होते हैं: 
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: 
धारा 189 - विधिविरुद्ध जमाव (Unlawful Assembly)। 
धारा 126 - सदोष अवरोध (Wrongful Restraint)। 
धारा 270 - लोक उपताप (Public Nuisance)।
धारा 285 - सार्वजनिक मार्ग में खतरा या बाधा पैदा करना। 

अन्य अधिनियम: 
मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 201 और 122: सार्वजनिक स्थान पर वाहन या भीड़ से यातायात बाधित करना।
राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 8B: अगर राष्ट्रीय राजमार्ग जाम हो तो लागू।

बिना अनुमति के मुख्य सड़क जाम करना और आम जनता को परेशान करना उपरोक्त धाराओं के तहत संज्ञेय अपराध बनता है। पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करवाई जा सकती है। आयोजक अथवा नेता और उसके साथियों को हिरासत में लिया जा सकता है। 

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख लैंडमार्क जजमेंट 

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि प्रदर्शन का अधिकार दूसरों के आने-जाने के अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(d)) और सार्वजनिक व्यवस्था से संतुलित होना चाहिए। मुख्य फैसले ये हैं: 
अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (शाहीन बाग मामला), 2020 (2020) 10 SCC 439
सबसे महत्वपूर्ण फैसला। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सार्वजनिक सड़कों और रास्तों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता। प्रदर्शन केवल निर्धारित स्थानों पर ही होने चाहिए। प्रशासन का कर्तव्य है कि सड़कें साफ रखे। “लोकतंत्र और असहमति साथ-साथ चलते हैं, लेकिन प्रदर्शन निर्धारित स्थानों पर ही होने चाहिए।” शाहीन बाग में सड़क जाम को अस्वीकार्य बताया गया।

मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ, 2018 (2018) 17 SCC 324
जंतर मंतर और बोट क्लब पर प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, लेकिन पुलिस को दिशानिर्देश बनाने होंगे। प्रदर्शन के अधिकार और आसपास रहने वालों/यातायात के अधिकार के बीच संतुलन जरूरी है। बिना अनुमति और बिना नियमन के प्रदर्शन नहीं हो सकते।

हिम्मत लाल के. शाह बनाम पुलिस आयुक्त, अहमदाबाद, 1973
सरकार सड़कों पर सार्वजनिक सभाओं को यातायात बाधा रोकने के लिए नियंत्रित कर सकती है, लेकिन सभी सड़कों पर सभाओं पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा सकती। 

रामलीला मैदान घटना मामले में स्वतः संज्ञान, 2012 (2012) 5 SCC 1
शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सभा का अधिकार लोकतंत्र की मूल विशेषता है। सरकार को इसे बढ़ावा देना चाहिए, लेकिन अगर आदेशों का उल्लंघन हो या हिंसा हो तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है।

इनके अलावा कई हाईकोर्ट फैसलों में चक्काजाम और बंद को अवैध और असंवैधानिक माना गया है। सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के आंदोलन जैसे मामलों में भी बार-बार कहा है कि सड़कें किसी भी कारण से जाम नहीं होनी चाहिए। संक्षेप में, भोपाल जैसी स्थिति में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ उपरोक्त धाराओं में मामला बन सकता है और प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सड़कें खाली कराने का अधिकार और कर्तव्य दोनों है। प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन दूसरों की जिंदगी ठप करने का नहीं।
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