रतीराम श्रीवास, टीकमगढ़। मध्यप्रदेश में शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले अतिथि शिक्षक वर्षों से अपने भविष्य को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। प्रदेश में सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, राजनीतिक समीकरण बदले, लेकिन अतिथि शिक्षकों की स्थिति जस की तस बनी हुई है। सवाल उठ रहा है कि आखिर अतिथि शिक्षकों को स्थायी रोजगार और सुरक्षित भविष्य कब मिलेगा?
अतिथि शिक्षक व्यवस्था की शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के कार्यकाल में हुई थी। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह व्यवस्था वर्षों बाद भी अपने भविष्य की लड़ाई लड़ती नजर आएगी। प्रदेश में अब तक कई मुख्यमंत्री बदल चुके हैं, लेकिन अतिथि शिक्षकों की नियमितीकरण की मांग आज भी अधूरी है।
शिवराज सरकार में भी उठी थी आवाज
अतिथि शिक्षकों के भविष्य को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में भी लगातार मांग उठती रही। वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी उस समय अतिथि शिक्षकों के प्रति सहानुभूति जताते हुए 15 मार्च 2018 को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर अतिथि शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित करने की मांग की थी।
इसके बाद वर्ष 2018 में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अतिथि शिक्षकों को नियमित करने का आश्वासन दिया, लेकिन कार्यकाल समाप्त होने तक यह वादा पूरा नहीं हो सका।
सिंधिया ने भी उठाई थी तलवार-ढाल बनने की बात
अतिथि शिक्षकों की समस्या को लेकर तत्कालीन कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने टीकमगढ़ जिले में आयोजित एक सभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि यदि कांग्रेस सरकार अतिथि शिक्षकों को नियमित नहीं करती है तो वे उनके समर्थन में तलवार और ढाल बनकर सड़क पर उतरेंगे।
लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। सिंधिया ने कांग्रेस से अलग होकर भाजपा का दामन थाम लिया और प्रदेश में एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने। अतिथि शिक्षकों को उम्मीद थी कि अब उनके संघर्ष का समाधान होगा, लेकिन उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हुईं।
अब सवाल डॉ. मोहन यादव सरकार से
वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जब सत्ता पक्ष में बिधायक थे, तब अतिथि शिक्षकों के भविष्य को लेकर पत्र लिखकर सहानुभूति जता चुके हैं। अब उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद अतिथि शिक्षक उनसे अपने पुराने रुख के अनुरूप ठोस निर्णय की उम्मीद कर रहे हैं।
अतिथि शिक्षकों का कहना है कि वे वर्षों से सरकारी स्कूलों में सेवाएं दे रहे हैं। कई शिक्षकों ने अपनी जवानी का बड़ा हिस्सा बच्चों को पढ़ाने में लगा दिया, लेकिन आज भी उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला। रोजगार की अनिश्चितता के कारण उनके परिवारों का भविष्य भी असुरक्षित बना हुआ है।
वादे बहुत हुए, अब फैसले का इंतजार
अतिथि शिक्षकों का दर्द यह है कि चुनाव और सत्ता के समय उनकी समस्याओं पर राजनीति तो खूब हुई, लेकिन सत्ता में आने के बाद उनके नियमितीकरण का मुद्दा पीछे छूटता गया। प्रदेश के लाखों परिवारों से जुड़े इस सवाल पर अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस नीति और समयबद्ध निर्णय की जरूरत है।
अतिथि शिक्षक अब सरकार से पूछ रहे हैं, आखिर कब तक अस्थायी व्यवस्था के नाम पर उनका शोषण होता रहेगा? कब उन्हें रोजगार की स्थिरता और सम्मानजनक भविष्य मिलेगा?
प्रदेश में पांच मुख्यमंत्री बदलने के बाद भी यदि अतिथि शिक्षक अपने हक के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं, तो यह केवल शिक्षकों का नहीं, बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और सरकार की नीति पर भी बड़ा सवाल है। अब देखना होगा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार vतिथि शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाती है या फिर यह मुद्दा भी अगले चुनाव तक केवल राजनीतिक वादों में ही उलझा रहेगा।

