श्री महालक्ष्मी राजवाड़ मंदिर महात्म्य कथा - Shri Mahalakshmi Rajwada Temple Mahatmya Katha

Updesh Awasthee
आज मैं आपको एक ऐसे मंदिर की कथा सुनाने जा रहा हूं जिसके कारण एक नगर में पिछले 800 वर्षों से धन की वर्षा हो रही है। व्यापारी सफल और प्रजा सुखी है। क्योंकि यहां साक्षात श्री महालक्ष्मी विराजमान है। मां इस नगर को इतना प्रेम करती है कि, 12 वर्षों तक बिना छत के, खुले आसमान के नीचे विराजमान रही लेकिन रूठ कर नहीं गईं। 

प्रथम अध्याय

हे श्रद्धालुओं! अब मैं आपको इंदौर की उस पावन धरा की कथा सुनाता हूँ जहाँ साक्षात धन की देवी माँ महालक्ष्मी विराजमान हैं। ऐतिहासिक राजवाड़ा के सम्मुख स्थित यह मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि होलकर राजवंश की अटूट श्रद्धा का केंद्र भी है। प्राचीन काल में, माँ की पूजा एक साधारण पुराने मकान में होती थी। समय बीतने के साथ, जब इंदौर होलकर रियासत की स्थायी राजधानी बना, तब महाराजा मल्हारराव होलकर द्वितीय अथवा महाराजा हरिराव होलकर के शासनकाल में इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। यह तीन मंजिला भवन लकड़ी से बना हुआ था। माँ यहाँ कमलासन पर विराजित हैं और उनके दोनों ओर गज (हाथी) उनकी सेवा में खड़े हैं, जो वैभव और समृद्धि के प्रतीक हैं। 

द्वितीय अध्याय: 

होलकर शासक माँ महालक्ष्मी को अपनी कुलदेवी के समान पूजते थे। ऐसी मान्यता है कि राज्य का खजाना (कोष) खोलने से पहले राजा स्वयं माँ के दर्शन करने आते थे। यहाँ तक कि राजवाड़ा के अधिकारी और कर्मचारी भी अपने कार्यों का आरम्भ माता के आशीर्वाद के बिना नहीं करते थे। इसी भक्ति का फल था कि होलकर काल में रियासत ने कभी आर्थिक अभाव नहीं झेला और प्रजा सुखी रही। मंदिर में भगवान गणेश, रिद्धि-सिद्धि, महादेव और हनुमान जी भी विराजमान हैं, जो भक्तों के सभी कष्टों को हर लेते हैं। 

तृतीय अध्याय: 

भक्तों! माँ की महिमा अपरम्पार है। सन् 1933 में राजवाड़ा क्षेत्र में एक अत्यंत भीषण आग लगी, जिसने मंदिर के लकड़ी से बने तीन मंजिला ऊँचे ढांचे को अपनी चपेट में ले लिया। मंदिर जलकर खाक हो गया, किंतु पुजारियों और भक्तों ने अपनी जान पर खेलकर माँ की मूल प्रतिमा को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। अगले 12 वर्षों तक माता खुले आसमान के नीचे रहीं, मानो अपने भक्तों के धैर्य की परीक्षा ले रही हों। अंततः सन् 1942 में इंदौर देवी अहिल्या ट्रस्ट द्वारा मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार किया गया और माँ पुनः अपने सिंहासन पर प्रतिष्ठित हुईं।

चतुर्थ अध्याय:

जो भक्त सच्चे मन से माँ की आराधना करते हैं, उनके घर कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती। विशेषकर दीपावली के समय, मंदिर पाँच दिनों तक दीयों की रोशनी से जगमगाता है। दीपावली की रात्रि को माँ का श्रृंगार 5 किलो सोने और 60 किलो चाँदी के आभूषणों से किया जाता है। यहाँ एक विशेष परंपरा है। भक्त माँ को पीले चावल अर्पित करते हैं और उन चावलों का कुछ अंश अपनी तिजोरी या व्यापारिक गल्ले में रखते हैं, जिससे वर्ष भर समृद्धि बनी रहती है। व्यापारी वर्ग यहाँ अपने नए बही-खातों की पूजा कर माँ से व्यापार वृद्धि का वरदान माँगता है।

पंचम अध्याय

हे भक्तजनों! अब मैं आपको माता के इस भव्य मंदिर की दिव्य वास्तुकला और आधुनिक महिमा के विषय में बताता हूँ। यह मंदिर पारंपरिक उत्तर भारतीय शैली में निर्मित है। इसके भव्य और अलंकृत शिखर, गर्भगृह और विशाल सभा मंडप को देखकर भक्तों का मन हर्षित हो जाता है। मंदिर के निर्माण में श्वेत संगमरमर और सुदृढ़ पत्थरों का उपयोग किया गया है, जिस पर की गई नक्काशी होलकर कालीन धार्मिक विरासत को दर्शाती है। 

जैसे-जैसे समय व्यतीत हुआ, मंदिर का वैभव और बढ़ता गया। लगभग 100 वर्ष पूर्व जीर्णोद्धार के पश्चात, लगभग 15 वर्ष पूर्व इस मंदिर का एक बार फिर व्यापक पुनर्सज्जा और आधुनिकीकरण किया गया। आज यह मंदिर केवल एक देवालय नहीं, बल्कि इंदौर नगर की व्यापारिक और सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। नवरात्रि और दीपावली के समय यहाँ लाखों श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है। जो व्यापारी अपने नए बही-खातों का पूजन यहाँ माता के चरणों में करते हैं, उनके व्यापार में माँ स्वयं लक्ष्मी रूप में निवास करती हैं। 

जो मनुष्य एकाग्र चित्त होकर इस पवित्र कथा का श्रवण या पठन करता है, माँ महालक्ष्मी उसके गृह को सुख, समृद्धि, और शांति से भर देती हैं। उसके जन्म-जन्मांतर के आर्थिक संकट और दरिद्रता का नाश होता है और अंत में वह माता के परम पद को प्राप्त करता है। 
॥ इति श्रीमदाचार्योपदेशजीविरचिता राजवाडास्थितश्रीमहालक्ष्मीमन्दिरस्य माहात्म्यकथा सम्पूर्णा ॥

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