नईदिल्ली/जबलपुर, 24 जुलाई 2026: मध्यप्रदेश में OBC आरक्षण को लेकर उच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई के बीच आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। भारतीय EWS संघ के अध्यक्ष एडवोकेट धीरज तिवारी ने भारत सरकार द्वारा गठित सिन्हो आयोग (Commission for Economically Backward Classes, 2010) की रिपोर्ट, NSSO के आंकड़ों, संविधान के 103वें संशोधन तथा मध्यप्रदेश शासन की रोस्टर प्रणाली का हवाला देते हुए EWS आरक्षण से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्यों को सार्वजनिक किया है।
संवैधानिक विषय पर चर्चा विधिक प्रावधानों के आधार पर होनी चाहिए
हाल के दिनों में EWS आरक्षण को लेकर अनेक भ्रामक जानकारियां प्रसारित की जा रही हैं, जिससे लाखों अभ्यर्थियों के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है। उन्होंने कहा कि किसी भी संवैधानिक विषय पर चर्चा तथ्यों, आयोगों की रिपोर्टों और विधिक प्रावधानों के आधार पर ही होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि सिन्हो आयोग ने वर्ष 2010 में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में 2001 की जनगणना तथा NSSO 2004-05 के आंकड़ों के आधार पर सामान्य (General Category) वर्ग की राज्यवार अनुमानित जनसंख्या का विस्तृत अध्ययन किया था।
भारत में सामान्य वर्ग की औसत अनुमानित जनसंख्या
आयोग के अनुसार भारत में सामान्य वर्ग की औसत अनुमानित जनसंख्या लगभग 31.2 प्रतिशत है, जबकि मध्यप्रदेश में यह लगभग 22.8 प्रतिशत आंकी गई थी। इसके अतिरिक्त
- उत्तरप्रदेश में 23.76 प्रतिशत,
- राजस्थान में 21.66 प्रतिशत,
- गुजरात में 36.52 प्रतिशत,
- महाराष्ट्र में 44.33 प्रतिशत,
- हरियाणा में 44.35 प्रतिशत,
- पंजाब में 43.53 प्रतिशत,
- हिमाचल प्रदेश में 54.10 प्रतिशत,
- उत्तराखंड में 56.04 प्रतिशत,
- पश्चिम बंगाल में 60.84 प्रतिशत,
- दिल्ली में 62.47 प्रतिशत तथा
- गोवा में 79.73 प्रतिशत
सामान्य वर्ग की आबादी बताई गई थी। आयोग की रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि सामान्य वर्ग के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की संख्या अत्यधिक है।
सामान्य वर्ग के गरीबों को आरक्षण का संवैधानिक आधार
रिपोर्ट के अनुसार सामान्य वर्ग के लगभग 5.85 करोड़ नागरिक गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे थे। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 17.5 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्रों में लगभग 19.3 प्रतिशत सामान्य वर्ग के परिवार गरीबी रेखा से नीचे थे। आयोग ने स्पष्ट रूप से माना था कि सामान्य वर्ग के गरीब नागरिकों की आर्थिक स्थिति भी अन्य गरीब वर्गों के समान गंभीर है और उन्हें विशेष संरक्षण एवं कल्याणकारी उपायों की आवश्यकता है। इसी पृष्ठभूमि में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को संवैधानिक संरक्षण देने की अवधारणा विकसित हुई और बाद में 103वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान के अनुच्छेद 15(6) एवं 16(6) जोड़कर EWS वर्ग के लिए 10 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रावधान किया गया।
EWS 10% आरक्षण का फॉर्मूला - Squeezing Method
यह भी स्पष्ट किया कि EWS आरक्षण को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी “स्क्वीजिंग मेथड (Squeezing Method)” को लेकर फैलाई गई है। सबसे पहली सच्चाई - EWS आरक्षण कुल रिक्त पदों का 10 प्रतिशत है स्क्वीजिंग मेथड को समझना हैं जरूरी। उन्होंने कहा कि अनेक लोग यह मानते हैं कि EWS आरक्षण सामान्य वर्ग के पदों में से 10 प्रतिशत निकालकर दिया जाता है, जबकि यह धारणा पूरी तरह गलत है। कुल पद 100 हैं तो EWS के लिए 10 पद होंगे। यह गणना अनारक्षित पदों के 10 प्रतिशत के रूप में नहीं, बल्कि कुल रिक्तियों के 10 प्रतिशत के रूप में होती है। अतः यह कहना कि EWS को सामान्य वर्ग के हिस्से से 10 प्रतिशत दिया जाता है, आरक्षण के वास्तविक गणित को गलत ढंग से प्रस्तुत करना है।
स्क्वीजिंग मेथड का वास्तविक अर्थ केवल निर्धारित रोस्टर प्रणाली के अनुसार कुल रिक्तियों का प्रशासनिक समायोजन (Roster Adjustment) करना है। जब किसी भर्ती में EWS आरक्षण लागू किया जाता है, तब कुल स्वीकृत रिक्तियों के आधार पर EWS के लिए 10 प्रतिशत पद निर्धारित किए जाते हैं। इसके पश्चात शासन द्वारा निर्धारित रोस्टर प्रणाली के अनुसार SC, ST, OBC, EWS तथा अनारक्षित वर्ग के रोस्टर बिंदुओं का समायोजन किया जाता है। इसी तकनीकी प्रक्रिया को व्यवहार में कई स्थानों पर “स्क्वीजिंग मेथड” कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि स्क्वीजिंग मेथड का अर्थ किसी वर्ग का आरक्षण कम करना या किसी दूसरे वर्ग का अधिकार छीनना नहीं है, बल्कि यह केवल रोस्टर तैयार करने की प्रशासनिक प्रक्रिया है ताकि सभी संवैधानिक आरक्षणों को विधिसम्मत रूप से लागू किया जा सके।
EWS आरक्षण मतलब अनारक्षित जातियों के निर्धन अभ्यर्थियों का आरक्षण
EWS आरक्षण को लेकर यह भ्रम भी फैलाया जाता है कि यह सामान्य वर्ग के पदों का 10 प्रतिशत है, जबकि व्यवहार में भर्ती प्रक्रिया में EWS आरक्षण का निर्धारण कुल रिक्तियों के आधार पर किया जाता है और उसके अनुरूप रोस्टर तैयार किया जाता है इस विषय को लेकर सोशल मीडिया और कुछ समाचारों में गलत व्याख्याएं प्रस्तुत की गईं, जिससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों अभ्यर्थियों के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई। EWS आरक्षण का मूल उद्देश्य किसी अन्य आरक्षित वर्ग के अधिकारों को प्रभावित करना नहीं, बल्कि ऐसे आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों को अवसर प्रदान करना है जो SC, ST और OBC आरक्षण की श्रेणियों में शामिल नहीं हैं।
EWS सभी वर्गों का क्षैतिज आरक्षण नहीं है
ओबीसी आरक्षण की मांग कर रहे नेताओं द्वारा प्रकाशित करवाए गए समाचार में यह दावा भी किया गया कि EWS का लाभ सभी वर्गों के गरीबों को मिलना चाहिए और इसे क्षैतिज आरक्षण के रूप में लागू किया जाना चाहिए। यह दावा संविधान के वर्तमान पाठ से मेल नहीं खाता। अनुच्छेद 15(6) एवं 16(6) के तहत EWS की श्रेणी उन नागरिकों के लिए बनाई गई है, जो पहले से SC, ST और OBC आरक्षण के अंतर्गत सम्मिलित नहीं हैं। केंद्र सरकार ने भी EWS आरक्षण को SC, ST और OBC आरक्षण से पृथक बताया है। इसलिए EWS को महिलाओं, दिव्यांगजन अथवा पूर्व सैनिकों जैसे प्रत्येक वर्ग के भीतर लागू होने वाला क्षैतिज आरक्षण बताना संवैधानिक योजना की सही व्याख्या नहीं है। EWS एक अलग आर्थिक आरक्षण श्रेणी है, जिसका संचालन वर्तमान व्यवस्था में पृथक वर्टिकल श्रेणी के रूप में किया जाता है।
EWS किसी दूसरे वर्ग के अधिकार का विरोध नहीं
सामाजिक न्याय का अर्थ एक वंचित वर्ग के अधिकार को दूसरे वंचित वर्ग के विरुद्ध खड़ा करना नहीं है। SC, ST और OBC वर्गों को दिया गया आरक्षण उनकी ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षणिक वंचना की संवैधानिक मान्यता है। उसी प्रकार EWS आरक्षण उन नागरिकों के लिए पृथक संवैधानिक व्यवस्था है, जो पूर्ववर्ती आरक्षित श्रेणियों में शामिल नहीं हैं, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर हैं। भारत सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि EWS आरक्षण SC, ST और OBC के आरक्षण से अलग है और उसे संविधान के अनुच्छेद 15(6) तथा 16(6) से संरक्षण प्राप्त है। इसलिए OBC आरक्षण की मांग को मजबूत करने के लिए EWS को असंवैधानिक, अनुचित या दूसरे वर्गों के हिस्से पर अतिक्रमण बताना आवश्यक नहीं है। दोनों वर्गों के दावों का निर्णय उनके पृथक संवैधानिक प्रावधानों और विश्वसनीय आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए।
मध्य प्रदेश में सामान्य वर्ग की आबादी 22% तो ईडब्ल्यूएस केवल 10% क्यों
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि मध्यप्रदेश में सामान्य वर्ग की अनुमानित आबादी लगभग 22.8 प्रतिशत है, तो EWS को केवल 10 प्रतिशत आरक्षण क्यों दिया गया है? यह एक वैधानिक एवं नीतिगत प्रश्न है, जिस पर सरकार और नीति-निर्माताओं को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। सिन्हो आयोग की रिपोर्ट आज भी इस कारण महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि उसने पहली बार सामान्य वर्ग के भीतर मौजूद आर्थिक विषमता और गरीबी का विस्तृत सांख्यिकीय विश्लेषण प्रस्तुत किया था। यही कारण है कि EWS आरक्षण पर होने वाली किसी भी गंभीर चर्चा में आयोग की रिपोर्ट, NSSO के आंकड़े तथा संविधान के 103वें संशोधन का उल्लेख महत्वपूर्ण माना जाता है।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के अधिकारों को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। भारतीय EWS संघ के अध्यक्ष ने सिन्हो आयोग (2010) की रिपोर्ट, NSSO के आंकड़ों तथा संविधान के 103वें संशोधन का हवाला देते हुए सवाल उठाया है कि यदि मध्यप्रदेश में सामान्य (General Category) की अनुमानित आबादी लगभग 22.8 प्रतिशत है, तो EWS के लिए केवल 10 प्रतिशत आरक्षण ही क्यों?
सिन्हो आयोग की रिपोर्ट का सही अर्थ समझना हैं जरूरी
मेजर जनरल सिन्हो आयोग ने सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की पहचान, उनकी स्थिति और उनके लिए कल्याणकारी उपायों का अध्ययन किया था। आयोग की रिपोर्ट 2010 में भारत सरकार को सौंपी गई थी और उसकी संस्तुतियां सरकार के विचाराधीन होने की जानकारी संसद में दी गई थी। यह भी तथ्य है कि सिन्हो आयोग ने स्वयं स्पष्ट शब्दों में 10 प्रतिशत संवैधानिक आरक्षण की उसी संरचना की अनुशंसा नहीं की थी, जो बाद में 103वें संविधान संशोधन द्वारा लागू की गई। रिपोर्ट मुख्यतः आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के लिए कल्याणकारी उपायों और उनकी पहचान पर केंद्रित थी।
इसलिए आयोग को सीधे 10 प्रतिशत EWS आरक्षण का एकमात्र विधायी आधार बताना अतिशयोक्ति होगा। परंतु रिपोर्ट का महत्व इस बात में है कि उसने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि गैर-आरक्षित सामान्य श्रेणी के भीतर भी करोड़ों आर्थिक रूप से कमजोर नागरिक मौजूद हैं, जिन्हें राज्य के संरक्षण और कल्याणकारी उपायों की आवश्यकता है।
सामान्य वर्ग में गरीबी की स्थिति को भी आयोग ने दर्ज किया
सिन्हो आयोग की रिपोर्ट में NSSO 2004-05 के आधार पर विभिन्न सामाजिक श्रेणियों में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी का तुलनात्मक अध्ययन किया गया था।
रिपोर्ट में General Category के संबंध में बताया गया कि:
• ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 17.5 प्रतिशत सामान्य वर्ग के परिवार गरीबी रेखा से नीचे थे।
• शहरी क्षेत्रों में लगभग 19.3 प्रतिशत सामान्य वर्ग के परिवार गरीबी रेखा से नीचे थे।
• सामान्य वर्ग के भीतर कुल BPL अनुपात लगभग 18.2 प्रतिशत अनुमानित किया गया।
• सामान्य वर्ग के लगभग 25.85 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे बताए गए।
रिपोर्ट ने यह भी कहा कि सामान्य वर्ग के गरीब लोग आर्थिक अन्य वर्गों के गरीब लोगों जितने ही अभावग्रस्त हो सकते हैं और उन्हें आर्थिक उन्नयन के लिए समकक्ष कल्याणकारी उपायों की आवश्यकता है।यही आंकड़े इस धारणा को खारिज करते हैं कि सामान्य वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति आर्थिक रूप से संपन्न है अथवा उसके भीतर गरीबी और वंचना मौजूद नहीं है।

