भोपाल समाचार, 27 जुलाई 2026: मूंग की दाल की सबसे खास बात ही होती है कि वह पचाने में सबसे आसान होती है और काफी औषधीय गुण होते हैं लेकिन मध्य प्रदेश की मूंग से राजनीति का हाजमा खराब हो रहा है। मध्य प्रदेश सरकार, किसने और केंद्र सरकार के बीच में फंसी हुई है। दोनों मानने को तैयार नहीं है और सरकार के पास कोई बीच का रास्ता भी नहीं है।
सबसे पहले समझिए मूंग का मामला क्या है
मामला मूंग खरीदी का है। मध्य प्रदेश में इस बार भी मूंग की दाल का बंपर उत्पादन हुआ है। हरदा और नर्मदापुरम बेल्ट में बहुत अधिक संख्या में किसान मूंग की दाल का उत्पादन कर रहे हैं। किसी जमाने में यह "पिपरिया की मूंग" के नाम से प्रसिद्ध हुआ करती थी। मतलब केवल पिपरिया क्षेत्र के किस मूंग की दाल का उत्पादन करते थे। कहते हैं कि पिपरिया की मूंग की दाल की क्वालिटी और औषधीय गुण भारत में पैदा होने वाली किसी भी मूंग की दाल से दोगुना हुआ करते थे। इसके कारण पिपरिया की मूंग फेमस हो गई और अब हालात यह की मध्य प्रदेश में नर्मदापुरम से लेकर हरदा तक हजारों किसान मूंग की दाल का उत्पादन करते हैं। जिसको "पिपरिया की मूंग" के नाम से बेचा जाता है। पहले पिपरिया की बूंद ऑर्गेनिक हुआ करती थी, अब उत्पादन बढ़ाने के लिए अत्यधिक मात्रा में केमिकल्स का उपयोग किया जाता है।
मध्य प्रदेश सरकार की प्रॉब्लम क्या है
मध्य प्रदेश में इस बार लगभग 20 लाख टन मूंग का उत्पादन हुआ है। जबकि मध्य प्रदेश को केंद्र सरकार ने केवल 25% कोटा दिया है। राज्य के कृषि मंत्री एडल सिंह कंसाना ने केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान से निवेदन किया कि, मध्य प्रदेश का कोटा 40% कर दिया जाए। शिवराज सिंह ने तो कोई जवाब नहीं दिया, उनके अधिकारियों ने कहा कि, फिलहाल ऐसा नहीं कर सकते। सबसे पहले आपको आवंटित किया गया 25% कोटा की खरीदारी पूरी करो, उसके बाद देखेंगे। श्री शिवराज सिंह के मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि, पिछले साल 3.5 लाख टन मूंग की अतिरिक्त खरीदी कर ली गई थी। वह आज भी गोदाम में पड़ी हुई है। मध्य प्रदेश के किसानों को समर्थन मूल्य देने के चक्कर में केंद्र सरकार को 3000 करोड़ का नुकसान हो गया है।
किसान भोपाल के लिए रवाना हो गए हैं
इधर किसान लगातार दबाव बना रहे हैं कि उनके द्वारा उत्पादित की गई है मूंग को समर्थन मूल्य पर खरीदा जाए। आज 27 जुलाई को किसान नर्मदापुरम से भोपाल के लिए रवाना हो गए हैं। घोषणा तो पदयात्रा की, की गई थी लेकिन रास्ते में पुलिस ने ट्रैक्टर ट्राली को रोकने के लिए बैरिकेडिंग की तो किसानों ने स्कॉर्पियो, बोलेरो इत्यादि गाड़ियों में भरकर भोपाल पहुंचना शुरू कर दिया है।
MP's Moong Procurement Row: State Government Caught Between Centre and Farmers
सरकार के सामने समस्या यह है कि एक तरफ केंद्र सरकार मानने को तैयार नहीं है और दूसरी तरफ दिल्ली वाले आंदोलन से उत्साहित होकर हरदा-नर्मदपुरम बेल्ट के किसान आंदोलन करने पर उतारू हो गए हैं। सरकारी खजाने में इतना पैसा नहीं है कि, किसानों की सारी दाल समर्थन मूल्य पर खरीद सकें। कुल मिलाकर तनाव की स्थिति बन गई है, और फिलहाल तो कोई रास्ता नहीं है।

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