भोपाल, 30 जुलाई 2026: हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश की ग्वालियर बेंच में विदिशा की आंगनवाड़ी कार्यकर्ता प्रियंका कुशवाह का मामला एक बेंचमार्क बन गया। सवाल यह है कि क्या कोई बर्खास्त कर्मचारी बहाल हो जाता है, तो उसके स्थान पर नवनियुक्त कर्मचारियों की सेवा समाप्त कर दी जाती है। क्या ऐसा कोई नियम है और यदि है तो क्या इसको न्यायपूर्ण कहा जाएगा? पढ़िए इस प्रकार के मामले में हाई कोर्ट ने क्या लैंडमार्क जजमेंट दिया है:-
मामले की पूरी कहानी: श्रीमती प्रियंका कुशवाह बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य (WP No. 13019/2018)
यह मामला विदिशा जिले की नटेरन तहसील के अंतर्गत आने वाली ग्राम पंचायत बिछिया के बिछिया आंगनवाड़ी केंद्र का है। इस केंद्र पर पहले प्रतिवादी संख्या 5 (पूर्व कार्यकर्ता) कार्यरत थीं। कर्तव्यों के निर्वहन में लापरवाही और आंगनवाड़ी केंद्र से लगातार अनुपस्थित रहने के आरोपों के कारण उन्हें कई कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे। संतोषजनक जवाब न मिलने पर, विभाग ने 16 नवंबर 2015 को उनकी सेवाएँ समाप्त कर दी थीं।
इसके बाद रिक्त हुए पद को भरने के लिए 16 फरवरी 2016 को नया विज्ञापन जारी किया गया। इस चयन प्रक्रिया में याचिकाकर्ता श्रीमती प्रियंका कुशवाह और बर्खास्त की गई पूर्व कार्यकर्ता (प्रतिवादी संख्या 5) दोनों ने भाग लिया। योग्यता सूची (Merit List) में प्रियंका कुशवाह ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, जबकि प्रतिवादी संख्या 5 आठवें स्थान पर रहीं। परिणामस्वरूप, 21 जुलाई 2016 को प्रियंका कुशवाह की नियुक्ति आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के रूप में कर दी गई।
कानूनी मोड़ और अपील का खेल
अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ प्रतिवादी संख्या 5 ने अपील दायर की थी। पहले उनकी स्टे (Stay) की अर्जी खारिज हुई और फिर अतिरिक्त कलेक्टर ने 15 जून 2016 को उनकी अपील भी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने अतिरिक्त आयुक्त (Additional Commissioner), भोपाल के समक्ष द्वितीय अपील दायर की।
31 मार्च 2018 को अतिरिक्त आयुक्त ने प्रतिवादी संख्या 5 की अपील स्वीकार करते हुए उनकी बहाली का आदेश दे दिया। प्रियंका कुशवाह ने इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, क्योंकि आयुक्त के इस फैसले से प्रियंका की नौकरी पर खतरा मंडरा रहा था।
न्यायालय में वकीलों की दलीलें
याचिकाकर्ता (प्रियंका कुशवाह) के वकील श्री गौरव मिश्रा की दलील:
याचिकाकर्ता ने योग्यता के आधार पर मेरिट में पहला स्थान प्राप्त किया है। प्रतिवादी संख्या 5 ने नई चयन प्रक्रिया में भाग लेकर अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देने का अधिकार स्वतः ही त्याग (Waive) दिया था।अतिरिक्त आयुक्त के समक्ष अपील के दौरान याचिकाकर्ता को पक्षकार (Party) नहीं बनाया गया और न ही उन्हें सुनने का अवसर दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
प्रतिवादी संख्या 5 के वकील श्री एम.पी.एस. रघुवंशी (वरिष्ठ अधिवक्ता) की दलील:
प्रियंका कुशवाह की नियुक्ति केवल एक 'स्टॉप-गैप' व्यवस्था थी, जो प्रतिवादी संख्या 5 की बर्खास्तगी के कारण हुई रिक्ति पर आधारित थी। पूर्व कार्यकर्ता की बर्खास्तगी प्रक्रिया में कानूनी खामियाँ थीं और प्राकृतिक न्याय का पालन नहीं किया गया था, जिसे आयुक्त ने सही ढंग से सुधार दिया। जब मूल बर्खास्तगी आदेश रद्द हो जाता है, तो उस रिक्ति पर हुई बाद की नियुक्तियाँ स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।
माननीय न्यायाधीश की विशेष टिप्पणी और निर्णय
मामले की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत ने माना कि सामान्यतः बाद में नियुक्त होने वाले व्यक्ति को पूर्ववर्ती कर्मचारी की बहाली पर पद छोड़ना पड़ता है, लेकिन इस मामले में न्यायाधीश महोदय ने एक महत्वपूर्ण मानवीय पहलू पर गौर किया।
न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता 2018 से लगातार सेवा में है और उसकी नियुक्ति को 8 वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है। न्यायाधीश ने 'डॉ. एम.एस. मुधोल बनाम एस.डी. हालेगकर' मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि जब किसी कर्मचारी की नियुक्ति में उसकी कोई गलती न हो और वह लंबे समय से काम कर रहा हो, तो उसे इस स्तर पर सेवा से हटाना अनुचित और अन्यायपूर्ण होगा।
न्यायालय का अंतिम आदेश
उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
प्रतिवादी संख्या 5 की बहाली: उन्हें तत्काल सेवा में बहाल किया जाए और उन्हें सभी परिणामी सेवा लाभ दिए जाएं (सिवाय पिछले वेतन के)।
प्रियंका कुशवाह का समायोजन: प्रशासन को आदेश दिया गया कि प्रियंका कुशवाह को किसी अन्य उपलब्ध रिक्त पद पर समायोजित किया जाए। यदि कोई पद रिक्त न हो, तो पास के किसी आंगनवाड़ी केंद्र में विशेष पद सृजित (Create) कर उन्हें वहां नियुक्त किया जाए।
समय सीमा: इस पूरी प्रक्रिया को आदेश की प्रति मिलने के तीन महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया गया है।
मामले का कानूनी पहलू LLB स्टूडेंट और वकीलों के लिए
यह याचिका मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 226 (Article 226) के तहत दायर की गई थी, जो उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति देता है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसकी नियुक्ति को प्रभावित करने वाला आदेश अनुच्छेद 14 (Article 14 - समानता का अधिकार), अनुच्छेद 16 (Article 16 - सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता) और अनुच्छेद 21 (Article 21 - जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) का उल्लंघन करता है।
न्यायालय ने इस बिंदु पर विचार किया कि अपील की कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता को पक्षकार (Necessary Party) नहीं बनाया गया और न ही उसे सुनने का अवसर दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत था।
Legal Precedents:
झुन्नीलाल यादव बनाम मध्य प्रदेश राज्य (RP No. 380/2012): न्यायालय ने इस मामले का उल्लेख यह स्पष्ट करने के लिए किया कि सामान्यतः जब मूल कर्मचारी की बर्खास्तगी रद्द होती है, तो उस रिक्ति पर नियुक्त बाद के कर्मचारी को पद छोड़ना पड़ता है।
डॉ. एम.एस. मुधोल बनाम एस.डी. हालेगकर (1993) 3 SCC 591: माननीय उच्च न्यायालय ने अपना निर्णय मुख्य रूप से सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक फैसले के आधार पर दिया। इस मामले के अनुसार, यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति में उसकी कोई गलती नहीं है और वह लंबे समय से सेवा में है, तो उसे इतने बाद के चरण में सेवा से हटाना उचित नहीं है।
निर्णय का आधार: न्यायालय ने 'साम्या' (Equities) के सिद्धांत और लंबे समय तक की गई सेवा के आधार पर निर्णय दिया। न्यायाधीश ने माना कि चूंकि याचिकाकर्ता 2018 से (8 वर्षों से अधिक) सेवा में थी और उसकी नियुक्ति में कोई धोखाधड़ी या उसकी गलती नहीं थी, इसलिए उसे सेवा से बाहर करना अन्यायपूर्ण होगा। अतः, कानून के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए याचिकाकर्ता को सेवा में बनाए रखने और पूर्व कार्यकर्ता को बहाल करने का आदेश दिया गया। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (विधि पत्रकार एवं सलाहकार)।

.webp)