लीगल न्यूज डेस्क, 3 जुलाई 2026: हाई कोर्ट ने वरिष्ठ अधिकारियों को कड़ा संदेश देते हुए, स्पष्ट किया कि कर्मचारियों में कड़ा संदेश देने के लिए, किसी कर्मचारी को बर्खास्त नहीं कर सकते। नियमों का पालन करना जरूरी है और प्रत्येक कार्रवाई से यह स्पष्ट होना चाहिए कि कानून का शासन स्थापित है। इसी के साथ जीपी द्वारा बर्खास्त किए गए एक पुलिस इंस्पेक्टर और दो आरक्षकों की सेवाओं को बहाल कर दिया गया।
जिस केस में सजा मिल चुकी है उसमें दोबारा सजा दे दी
इंस्पेक्टर नीरज कुमार अप्रैल 2001 में भर्ती हुए और 2016 में इंस्पेक्टर बने। 2021 में इनके खिलाफ भ्रष्टाचार और एनडीपीएस की धाराओं में मामले दर्ज हुए। विभाग ने जांच की और अप्रैल 2023 में इन्हें केवल दो साल के लिए वेतन वृद्धि रोकने का लघु दंड देकर बहाल कर दिया। वे तब से ड्यूटी कर रहे थे। लेकिन अचानक तीन साल बाद डीजीपी ने सीधे बर्खास्तगी का आदेश थमा दिया। कांस्टेबल रजत चंदेल और राहुल वर्मा के खिलाफ अगस्त 2024 में शिमला में एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ था। दोनों के खिलाफ विभागीय जांच और कोर्ट ट्रायल अभी चल ही रहे थे कि बीच में ही डीजीपी ने अंतिम फैसले का इंतजार किए बिना इन्हें नौकरी से निकाल दिया।
High Court: Employees Cannot Be Dismissed Merely to Send a Strong Message
सुनवाई के दौरान राज्य के महाधिवक्ता ने दलील दी थी कि नशा तस्करी में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ कड़े संदेश देने और राज्य को ड्रग फ्री बनाने के लिए डीजीपी ने यह सख्त कदम उठाया था। अदालत ने सरकार की इस चिंता और गंभीरता की सराहना तो की,लेकिन प्रशासनिक मनमानी पर फटकार लगाते हुए कहा कि हम विभाग की चिंता को समझते हैं। चाहे कुछ भी हो जाए, कानून का शासन सर्वोपरि है। यदि कानून के रक्षक ही बिना प्रक्रिया के सजा देने लगेंगे, तो न्याय की मूल भावना ही समाप्त हो जाएगी।
पहले से तय मानसिकता से लिया गया था फैसला
अदालत ने पाया कि पुलिस महानिदेशक द्वारा 12 जनवरी 2026 को जारी बर्खास्तगी आदेश ऐसा प्रतीत होता है तो प्राधिकारी ने पहले से ही मन बना लिया था कि उन्हें इन कर्मचारियों को निकालना है और फिर उस फैसले को सही ठहराने के लिए नियमों का मनमाना सहारा लिया गया, जो कि सत्ता का रंगीन प्रयोग है।

.webp)