केंद्रीय कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से राहत भरी खबर - Forum non conveniens मामला

Updesh Awasthee
नई दिल्ली, 12 जून 2026:
भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) ने बख्शिश अहमद बनाम भारत संघ मामले में 'फोरम नॉन कन्वीनियन्स' (Forum Non Conveniens) के विषय में कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। यह राहत खास तौर पर ऐसे सरकारी कर्मचारियों के लिए बहुत ज्यादा उपयोगी है जिनका अक्सर ट्रांसफर होता रहता है। 

Second marriage without permission and dismissal under BSF Rules 1969

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, अपीलकर्ता बख्शिश अहमद 31 दिसंबर 2010 को सीमा सुरक्षा बल (BSF) में शामिल हुए थे और वह पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के नारायणपुर में 44वीं बटालियन (44 Bn) में तैनात थे। उन पर आरोप था कि पहली पत्नी के जीवित रहते और बिना विभाग की अनुमति के, उन्होंने 6 मई 2022 को दूसरी शादी कर ली, जिसे उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में पंजीकृत कराया गया था। इसे बीएसएफ नियम, 1969 के नियम 7 और केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964 के नियम 21 का उल्लंघन मानते हुए, कमांडेंट (44 Bn) ने बीएसएफ नियम 22 और 177 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए 27 अक्टूबर 2022 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया था।

Jurisdiction of Delhi High Court and situs of respondent office under Article 226

बर्खास्तगी के खिलाफ अहमद की वैधानिक याचिका (Statutory Petition) को आईजी (Frontier HQ, BSF Jammu) ने 22 दिसंबर 2023 को खारिज कर दिया था। इसके बाद अहमद ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चूंकि बर्खास्तगी पश्चिम बंगाल में हुई और अपील जम्मू में खारिज हुई, इसलिए दिल्ली 'उचित मंच' (Convenient Forum) नहीं है। अपीलकर्ता के वकील श्री इनायती ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 226(1) के तहत यदि वह प्राधिकारी (जैसे महानिदेशक BSF और गृह मंत्रालय) दिल्ली में स्थित है जिसके खिलाफ रिट मांगी गई है, तो हाईकोर्ट को सुनवाई का अधिकार है। उन्होंने 'अबरार अली बनाम सीआईएसएफ' मामले का हवाला देते हुए कहा कि मुख्यालय की दिल्ली में स्थिति क्षेत्राधिकार के लिए पर्याप्त है। 

Arguments of Union of India and integral part of cause of action

प्रतिवादी (भारत संघ) की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुश्री ऐश्वर्या भाटी ने तर्क दिया कि चूंकि 'वाद-हेतु' (Cause of Action) का कोई भी हिस्सा दिल्ली में उत्पन्न नहीं हुआ है, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट उचित मंच नहीं है। उन्होंने 'आरिफ अजीम कंपनी लिमिटेड' मामले का हवाला देते हुए कहा कि 'फोरम नॉन कन्वीनियन्स' का सिद्धांत अदालत को विवेक देता है कि वह किसी अन्य अधिक उपयुक्त मंच (जैसे कलकत्ता हाईकोर्ट या जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट) पर जाने का निर्देश दे सके। उनका तर्क था कि केवल कार्यालय का पता दिल्ली में होने से मामला वहां चलाने की अनिवार्यता नहीं बनती।

Supreme Court verdict and limits of Forum Non Conveniens in constitutional remedies

उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में दिल्ली हाईकोर्ट के रुख को गलत पाया। न्यायालय ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जहाँ संवैधानिक उपचार (Constitutional Remedy) का प्रश्न हो और क्षेत्राधिकार अनुच्छेद 226(1) से जुड़ा हो, वहां 'फोरम नॉन कन्वीनियन्स' का सिद्धांत बहुत कम ही लागू होना चाहिए। न्यायालय के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:
प्रतिवादी की स्थिति: चूंकि महानिदेशक (BSF) और गृह मंत्रालय के कार्यालय दिल्ली में हैं, इसलिए अनुच्छेद 226(1) के तहत दिल्ली हाईकोर्ट को क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
रिकॉर्ड की उपलब्धता: जब 'सर्टिओरारी' (Certiorari) रिट मांगी जाती है, तो मामले के रिकॉर्ड प्रतिवादियों के कार्यालयों में ही उपलब्ध होते हैं, इसलिए दिल्ली उनके लिए भी सुविधाजनक मंच है।
न्याय तक पहुंच: सुइटर (याचिकाकर्ता) द्वारा प्रतिवादियों के लिए सुविधाजनक मंच चुनने के बाद उसे तकनीकी आधार पर मना करना न्याय से वंचित करने जैसा होगा।

Restoration of writ petition in Delhi High Court and legal directions

अंततः, सुप्रीम कोर्ट न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और स्पष्ट किया कि यदि प्रतिवादी संस्थान का मुख्यालय दिल्ली में स्थित है, तो संवैधानिक उपचारों के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार को केवल इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि घटना का स्थान कहीं और था। बख्शिश अहमद की याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट में बहाल (Revived) कर दिया। न्यायालय ने प्रतिवादियों को काउंटर हलफनामा (Counter Affidavit) दाखिल करने के लिए दो महीने का समय दिया और याचिका को योग्यता के आधार पर जल्द निपटाने का निर्देश दिया। यह फैसला स्पष्ट करता है कि central armed police forces CAPF के सदस्य अपने मुख्यालयों वाले अधिकार क्षेत्र में न्याय की गुहार लगा सकते हैं और तकनीकी आधार पर उनकी याचिकाओं को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। 

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