भोपाल समाचार, 28 जून 2026: कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष को आप जानते हो। हां सब जानते हैं, कांग्रेस के युवा नेता हैं, गजब की एनर्जी है, कैमरा उनको बहुत पसंद करता है और वह भी कैमरे को बड़ा प्यार करते हैं, राहुल गांधी के बड़े खास हैं और नाम है जीतू पटवारी लेकिन क्या आप जानते हो यह एक मात्र उनका नाम नहीं है। कुछ लोग कहेंगे हां, हमें मालूम है, उनका असली नाम जितेंद्र पटवारी है लेकिन क्या आपको मालूम है इससे पहले भी उनका एक नाम था। ऐसे ही नहीं, उसे नाम के नाम बड़ी सारी प्रॉपर्टी थी। मतलब भाई साहब नाम बदलते रहते हैं, और हर नाम के नाम प्रॉपर्टी होती है।
How Many Names Does Jitu Patwari Have?
यह कहानी कुछ ऐसी है जैसे बहुत कम लोग जानते हैं। जीतू पटवारी का असली नाम महेश पटवारी है। यह उनका घर का नाम नहीं है। घर का नाम तो जीतू, मुन्ना पप्पू इत्यादि होता है। पैतृक संपत्ति के हिस्सेदारों में महेश पटवारी का नाम ही दर्ज है। पैतृक संपत्ति भी थोड़ी बहुत नहीं है। जिस जमीन पर वेयरहाउस बना है, वही वेयरहाउस जिसे संजय नगायच ने हाल ही में डमरू की तरह बजा दिया था। वह जमीन भी पैतृक जमीन है। इस जमीन के हिस्सेदारों में महेश पटवारी का नाम है, जिसको अपन लोग जीतू पटवारी के नाम से जानते हैं।
किसी को नहीं पता कि कौन से बाबा ने कब कहा और किसने, क्यों मान लिया, लेकिन बाद में महेश पटवारी, जितेंद्र पटवारी बन गए। जितेंद्र पटवारी के नाम से भी काफी संपत्ति है। फिर पॉलिटिक्स में सक्रिय हुए तो अपना नाम जीतू पटवारी बताया। प्रॉपर्टी में, बैंक में, बाकी सब जगह सरकारी दस्तावेजों में जो व्यक्ति जितेंद्र पटवारी था, समाज के सामने वह जीतू पटवारी था। पिछले 10 साल के सारे विज्ञापन, होर्डिंग, बैनर, पोस्टर उठाकर देख लीजिए। सिर्फ जीतू पटवारी मिलेगा। जीतू उर्फ जितेंद्र पटवारी नहीं मिलेगा।
सवाल यह है कि क्या इसके अलावा भी कोई नाम है, जिसके नाम कोई संपत्ति है। सवाल यह भी है कि बार-बार नाम बदलने की जरूरत क्या पड़ती है। महेश पटवारी अच्छा नाम था, फिर क्या जरूरत थी बदलने की। हम मध्य प्रदेश के लोग जब किसी का नाम बदलता है तो बड़े कंफ्यूज हो जाते हैं, व्यापम याद आ जाता है।
Jitu Patwari's warehouse built by the grace of BJP?
एक और बात है जो बहुत कम लोग बताते हैं। जीतू पटवारी ने सरकारी योजनाओं की सब्सिडी लेकर वेयरहाउस बनाया था। यह अकेले जीतू पटवारी का नहीं है बल्कि इसमें लक्ष्य वेयरहाउस एवं पार्टनर्स के नाम पर है। पार्टनर्स में महेश उर्फ जितेंद्र पिता रमेशचंद्र पटवारी, भारत पटवारी, रजनीश पटवारी एवं कुलभूषण पटवारी के नाम हैं। इन सब ने मिलकर बैंक ऑफ बड़ौदा की नौलखा शाखा से 2014 से 15 के बीच तीन किस्तों में आठ करोड़ 15 लाख का संयुक्त लोन लिया था।
मतलब पैतृक जमीन, सरकार से सब्सिडी और बैंक से लोन लेकर वेयरहाउस बनाया। अपनी पोटली से कौड़ी भी नहीं लगाई। 2014-15 वही समय है जब कमलनाथ मध्य प्रदेश में सक्रिय हो रहे थे। अरुण यादव प्रदेश अध्यक्ष बने थे। अजय सिंह राहुल भैया नेता प्रतिपक्ष थे। मतलब शिवराज सरकार की घेराबंदी शुरू हो गई थी। ठीक इसी समय विपक्षी पार्टी के नेता ने सरकारी मदद से वेयरहाउस बनाया। बताने की जरूरत नहीं की वेयरहाउस के लिए सब्सिडी नियम अनुसार आवेदन करने और योग्यता धारण करने से नहीं मिलती। मध्य प्रदेश में इसके लिए तगड़ी पॉलिटिकल अप्रोच लगती है। पॉलिटिक्स में संभावना के आधार पर अंदाज लगाने का बड़ा खेल चलता है। यह भी संभव हो सकता है कि, 2015 में भाजपा की तरफ से वेयरहाउस के लिए मदद इसलिए दी गई थी ताकि जब वक्त आए तो जीतू पटवारी, भाजपा के काम आएं।
Why Shivraj Singh Government Took Strict Action
जिस शिवराज सरकार में जीतू पटवारी को वेयरहाउस के लिए लोन और सब्सिडी मिली। 2018 के चुनाव में जीतू पटवारी ने उसी शिवराज सिंह चौहान का पीछा किया और ताबड़तोड़ हमले किए। वेयरहाउस का उपकार भूल गए। कांग्रेस की सरकार भी बनी लेकिन 15 महीने बाद जब सरकार गिरी और शिवराज सिंह फिर से मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने जीतू पटवारी की सारी चूड़ियां कस दी थी।
आपको वह लेटेस्ट वीडियो याद होगा जिसमें जीतू पटवारी बोल रहे थे कि हमारा वेयरहाउस खाली कर दो। कमलनाथ के बाद शिवराज सिंह जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सच में जीतू पटवारी का बिहार हाउस खाली कर दिया था। हालत यह हो गई थी कि बैंक का लोन नहीं चुका पा रहे थे। बैंक ने कोर्ट में केस ठोक दिया और कुर्की की नौबत आ गई थी। तब जीतू पटवारी ने कहा था कि सरकार हमारे वेयरहाउस में गेहूं नहीं रख रही है, इसलिए हम डिफाल्टर हो गए।

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